राजस्थान के मेडिकल कॉलेजों में टीचर्स भर्ती पर बवाल: ग्रामीण स्वास्थ्य और पढ़ाई पर मंडराया खतरा?

राजस्थान सरकार के ग्रुप-2 स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स को मेडिकल कॉलेजों में टीचर्स बनाने के फैसले का ग्रुप-1 डॉक्टर्स ने विरोध किया, क्योंकि इससे मेडिकल एजुकेशन की गुणवत्ता और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

Aug 31, 2025 - 12:02
राजस्थान के मेडिकल कॉलेजों में टीचर्स भर्ती पर बवाल: ग्रामीण स्वास्थ्य और पढ़ाई पर मंडराया खतरा?

राजस्थान सरकार ने प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों में टीचिंग स्टाफ की कमी को दूर करने के लिए नया कदम उठाया है। नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) के दिशा-निर्देशों के तहत ग्रुप-2 के पोस्टग्रेजुएट (PG) स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स को उनके अनुभव के आधार पर मेडिकल कॉलेजों में फेकल्टी (टीचर्स) के रूप में नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। इस फैसले से सरकार का मकसद मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई की गुणवत्ता को बेहतर करना और स्टूडेंट्स की पढ़ाई को पटरी पर लाना है।

लेकिन इस फैसले ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। ग्रुप-1 के डॉक्टर्स, जो राजस्थान मेडिकल कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन से जुड़े हैं, ने इस कदम का कड़ा विरोध शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि बिना राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की परीक्षा के इस तरह सीधे टीचर्स की नियुक्ति से कई गंभीर समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

ग्रुप-1 डॉक्टर्स की चिंता मेडिकल एजुकेशन और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर असर

राजस्थान मेडिकल कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन ने सरकार के सामने अपनी चिंताएं रखते हुए कहा है कि बिना RPSC परीक्षा के ग्रुप-2 के डॉक्टर्स को फेकल्टी बनाने से मेडिकल एजुकेशन की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ेगा। एसोसिएशन का कहना है कि ये स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स अभी ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में मरीजों को सेवाएं दे रहे हैं। अगर इन्हें मेडिकल कॉलेजों में टीचर्स के तौर पर स्थानांतरित किया गया, तो ग्रामीण इलाकों में मेडिकल सुविधाएं बुरी तरह प्रभावित होंगी।

इसके अलावा, एसोसिएशन ने यह भी दावा किया है कि ग्रुप-2 के डॉक्टर्स के पास रिसर्च और टीचिंग का अनुभव नहीं है, जिसके चलते मेडिकल कॉलेजों में रिसर्च कार्य भी प्रभावित हो सकता है। एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने यह फैसला वापस नहीं लिया, तो वे भविष्य में आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

ग्रुप-2 डॉक्टर्स का पक्ष पढ़ाई और मरीजों की सेवा दोनों संभव

दूसरी ओर, अखिल राजस्थान सेवारत चिकित्सक संघ (अरिसदा), जो ग्रुप-2 के स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स का प्रतिनिधित्व करता है, ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। अरिसदा के पदाधिकारियों का कहना है कि प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में MBBS स्टूडेंट्स को पढ़ाने के लिए टीचर्स की भारी कमी है, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है। ग्रुप-2 के डॉक्टर्स को फेकल्टी के तौर पर नियुक्त करने से यह कमी पूरी हो सकती है।

उनका यह भी कहना है कि इस कदम से सरकार पर कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा, क्योंकि ये डॉक्टर्स पहले से ही सरकारी वेतनमान पर काम कर रहे हैं। वे मेडिकल कॉलेजों में टीचिंग के साथ-साथ अस्पतालों में मरीजों का इलाज भी जारी रख सकते हैं। इससे न केवल स्टूडेंट्स की पढ़ाई बेहतर होगी, बल्कि मरीजों को भी पहले की तरह सेवाएं मिलती रहेंगी।

RPSC भर्ती की जरूरत नहीं, लेकिन विवाद गहराया

अरिसदा ने यह भी तर्क दिया है कि RPSC के जरिए नई भर्तियां करने में समय और पैसा दोनों खर्च होंगे, जबकि ग्रुप-2 के डॉक्टर्स पहले से ही PG डिग्रीधारी हैं और RPSC भर्ती में भी यही योग्यता मांगी जाती है। ऐसे में मौजूदा डॉक्टर्स को फेकल्टी बनाना ज्यादा व्यावहारिक है।

हालांकि, ग्रुप-1 के डॉक्टर्स इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि RPSC की परीक्षा एक निष्पक्ष और मानकीकृत प्रक्रिया है, जो यह सुनिश्चित करती है कि केवल योग्य और अनुभवी डॉक्टर्स ही मेडिकल कॉलेजों में टीचिंग की जिम्मेदारी संभालें। इस प्रक्रिया को दरकिनार करने से न केवल एजुकेशन की गुणवत्ता प्रभावित होगी, बल्कि यह उन डॉक्टर्स के साथ भी अन्याय होगा, जो RPSC के जरिए मेहनत करके फेकल्टी बने हैं।

Yashaswani Journalist at The Khatak .