वैवाहिक अधिकार बहाली की याचिका खारिज, पति को मिला तलाक: कोर्ट ने पत्नी के आरोपों में विरोधाभास मानते हुए क्रूरता को माना आधार
फैमिली कोर्ट जयपुर ने 19 मार्च 2026 को दिए फैसले में पत्नी की वैवाहिक अधिकार बहाली की याचिका खारिज कर दी और पति को तलाक दे दिया। कोर्ट ने पत्नी के आरोपों में विरोधाभास पाए और पति द्वारा साबित की गई मानसिक एवं शारीरिक क्रूरता को आधार मानते हुए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक मंजूर किया। शादी 2016 में हुई थी और दंपति की एक बेटी है।
जयपुर। फैमिली कोर्ट जयपुर महानगर प्रथम (क्रम संख्या-4) ने 19 मार्च 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद का अंत कर दिया। अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत पत्नी द्वारा दायर वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका खारिज कर दी, जबकि धारा 13 के तहत पति की तलाक की अर्जी को मंजूर कर लिया।
कोर्ट ने इस मामले में पत्नी के लगाए गए आरोपों में कई विरोधाभास पाए और इन्हें आधार बनाते हुए पति के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत का मानना था कि पत्नी यह साबित नहीं कर पाई कि पति बिना किसी उचित कारण के उससे अलग हुआ था, वहीं पति अपने आरोपों को साबित करने में सफल रहा। दोनों पक्षों की शादी 22 फरवरी 2016 को हुई थी और उनके एक बेटी भी है।
पति के वकील का बयान
पति की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट डी. एस. शेखावत ने बताया कि कोर्ट ने दोनों याचिकाओं की सुनवाई एक साथ की, क्योंकि दोनों एक ही शादी से जुड़ी थीं और आरोप भी परस्पर जुड़े हुए थे। इससे मामले की जांच और समझना आसान हुआ।
क्या था पूरा मामला?
शादी के कुछ समय बाद ही पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गए थे। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पत्नी ने साथ रहने के लिए कोर्ट में वैवाहिक अधिकार बहाली की याचिका दायर की, जबकि पति ने तलाक की अर्जी लगा दी। दोनों मामलों की संयुक्त सुनवाई हुई।
पत्नी के आरोप:पत्नी ने कोर्ट में दावा किया कि शादी के बाद उसे दहेज को लेकर परेशान किया गया।कम सामान लाने पर ताने दिए गए।उसे जादू-टोना करने वाली कहा गया।कई बार गाली-गलौज और मारपीट की गई।उसे गलत तरीके से घर से निकाल दिया गया।इसलिए उसने कोर्ट से दोबारा साथ रहने का आदेश देने की मांग की।
पति के आरोप:पति ने सभी आरोपों को पूरी तरह गलत बताया।उसने कोर्ट में कहा कि पत्नी अक्सर झगड़ा करती थी, उसे और उसके परिवार वालों को गालियां देती थी।कई बार पुलिस बुला लेती थी।दहेज के झूठे केस में फंसाने की धमकी भी देती थी।इन व्यवहारों को पति ने मानसिक और शारीरिक क्रूरता बताया और इसी आधार पर तलाक मांगा।
सुनवाई में क्या सामने आया?
कोर्ट ने दोनों पक्षों के बयान, सबूत, जिरह, महिला आयोग में दी गई शिकायतें और सुलह की कोशिशों का विस्तार से अध्ययन किया। अदालत को पत्नी के बयानों में कई विरोधाभास मिले।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि 2017 में गंभीर आरोप लगने के बावजूद दोनों पक्ष कुछ समय तक साथ रहे थे, जिसमें मेड़ता में रहना भी शामिल था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पत्नी यह साफ-साफ नहीं बता सकी कि वह कब से अलग रह रही है और अलगाव का ऐसा कौन सा बड़ा कारण था, जिसकी वजह से वे हमेशा के लिए अलग हो गए।
क्रूरता की परिभाषा और कानूनी आधार
फैसले में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शोभा रानी बनाम मधुकर रेड्डी मामले का हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि क्रूरता केवल शारीरिक मारपीट तक सीमित नहीं है। मानसिक दबाव, अपमान, डर पैदा करना या ऐसा व्यवहार जिससे साथ रहना मुश्किल हो जाए, वह भी क्रूरता मानी जाती है।कोर्ट ने कहा कि धारा 9 के तहत पत्नी की जिम्मेदारी थी कि वह साबित करे कि पति बिना किसी वजह के उसे छोड़कर गया, लेकिन वह इसमें असफल रही। वहीं, पति के आरोप और सबूतों से पत्नी का व्यवहार क्रूरता के दायरे में आता पाया गया।
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि दोनों के बीच कई बार समझौते की कोशिश हुई और पत्नी वापस साथ रहने भी आई, लेकिन उसने अपने केस वापस नहीं लिए। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने पति के पक्ष को सही माना।
अंतिम फैसला
इन आधारों पर फैमिली कोर्ट ने पत्नी की वैवाहिक अधिकार बहाली की याचिका खारिज कर दी और पति को तलाक की डिक्री दे दी। इससे दोनों का विवाह कानूनी रूप से समाप्त हो गया।