‘विधवा का दर-दर भटकना कानून की हत्या करने जैसा’: झुंझुनूं कंज्यूमर कोर्ट ने LIC पर लगाई पेनल्टी, क्लेम प्रक्रिया पर उठाए सवाल
झुंझुनूं जिला उपभोक्ता आयोग ने LIC की कार्यशैली पर सख्त टिप्पणी करते हुए किसान की विधवा को लंबे समय तक बीमा क्लेम से वंचित रखने को “कानून की आत्मा की हत्या” बताया। आयोग ने LIC पर जुर्माना लगाते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया।
झुंझुनूं जिला उपभोक्ता आयोग ने भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के खिलाफ एक महत्वपूर्ण फैसले में सख्त टिप्पणी की है। आयोग ने कहा कि बीमा क्लेम के नाम पर उपभोक्ताओं को वर्षों तक कानूनी पचड़ों में उलझाना “उपभोक्ता संरक्षण कानून की आत्मा की हत्या” जैसा है।
आयोग ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें एक किसान की मृत्यु के बाद उसकी विधवा को लगभग 9 साल 4 महीने तक बीमा राशि पाने के लिए संघर्ष करना पड़ा।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
आयोग अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने सुनवाई के दौरान कहा कि ग्रामीण और किसान वर्ग से बीमा प्रीमियम समय पर वसूला जाता है, लेकिन क्लेम के समय उन्हें अनावश्यक कानूनी प्रक्रियाओं और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है।
उन्होंने इसे बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि यह स्थिति उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के मूल उद्देश्य के खिलाफ है।
क्या है पूरा मामला
यह मामला सहकार जीवन सुरक्षा बीमा योजना से जुड़ा है, जिसमें झुंझुनूं जिले के चुड़ैला ग्राम सेवा सहकारी समिति के 395 किसानों ने LIC की पॉलिसी ली थी।
चुड़ैला निवासी श्योराम ने 2012 में पॉलिसी ली थी और नियमित रूप से प्रीमियम जमा कर रहे थे। फरवरी 2013 में उनकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनकी पत्नी सजना देवी ने बीमा क्लेम के लिए आवेदन किया। लेकिन LIC की ओर से लंबे समय तक कोई भुगतान नहीं किया गया और दावा तकनीकी कारणों से खारिज कर दिया गया।
इसके बाद मामला 2016 में जिला उपभोक्ता आयोग पहुंचा।
9 साल से ज्यादा चली लड़ाई
आयोग ने पाया कि इस पूरे मामले में LIC की ओर से गंभीर लापरवाही बरती गई, जिसके चलते पीड़िता को वर्षों तक न्याय के लिए इंतजार करना पड़ा।
मुआवजे का आदेश
कोर्ट ने LIC को निर्देश दिया है कि वह—
- ₹5,54,275 बीमा राशि
- ₹85,000 पेनल्टी
- ₹1.5 लाख विशेष क्षतिपूर्ति
पीड़ित महिला को अदा करे।
मुख्य सचिव को भेजी गई कॉपी
आयोग ने इस फैसले की कॉपी राज्य के मुख्य सचिव को भी भेजी है ताकि भविष्य में किसानों और मजदूरों से जुड़ी बीमा योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।