ममता से मर्डर तक: आखिर क्यों बच्चों की कातिल बन रही हैं मम्मियां? देशभर की घटनाओं ने खड़े किए बड़े सवाल
केरल से गाजियाबाद और राजस्थान से तेलंगाना तक बच्चों की हत्या में मांओं के नाम सामने आने की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया है।
केरल में एक मां ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर 18 महीने के मासूम बच्चे की पसलियां तोड़ दीं और उसके शरीर पर 91 घाव दिए। वहीं गाजियाबाद में एक सौतेली मां ने दूध मांगने पर 3 साल की बच्ची को मौत के घाट उतार दिया। इन घटनाओं को पढ़ने और सुनने के बाद हर किसी के मन में एक ही सवाल उठ रहा है कि आखिर समाज किस दिशा में जा रहा है?
मां... एक ऐसा शब्द जिसे सदियों से प्रेम, त्याग और समर्पण की मिसाल माना जाता है। मां को ममता की मूरत कहा जाता है। वह अपने बच्चों के लिए हर दर्द सह लेती है, अपनी खुशियां कुर्बान कर देती है और हर मुश्किल में उनके सामने ढाल बनकर खड़ी रहती है। शायद यही वजह है कि भारतीय संस्कृति में मां को भगवान के समान दर्जा दिया गया है।
हिंदी सिनेमा ने भी हमेशा मां की इसी छवि को पर्दे पर उतारा है। चाहे 1957 में आई नर्गिस की फिल्म "मदर इंडिया" हो, 1991 में आई जयाप्रदा और जितेंद्र की "मां", या फिर 2017 में रिलीज हुई श्रीदेवी की "मॉम"। दौर बदलता गया, लेकिन फिल्मों में मां का चरित्र हमेशा अपने बच्चों के लिए लड़ने और त्याग करने वाली महिला के रूप में ही दिखाया गया।
लेकिन असल जिंदगी की कुछ घटनाएं इन कहानियों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही हैं।
मां का बदलता चेहरा?
आजकल सामने आ रही घटनाएं मां का एक ऐसा चेहरा दिखा रही हैं, जिसे देखकर रूह कांप उठती है। एक ऐसा चेहरा जो बेरहम है, क्रूर है, हिंसक है और कई मामलों में स्वार्थ से भरा हुआ दिखाई देता है।
केरल की अखिला, ओडिशा की रंजीता, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश और राजस्थान की कुछ महिलाओं के मामलों ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर मातृत्व की भावना को क्या हो गया है।
मैंने तो बचपन से मां को सिर्फ प्यार लुटाते देखा है। अगर घर में एक रोटी बचती थी तो मां कहती थी, "मुझे भूख नहीं है", और वह रोटी भी मुझे खिला देती थी। पिता की डांट से बचाने से लेकर मेरी हर छोटी-बड़ी जिद पूरी करने तक, मां ने जो कुछ किया, उसे देखकर कभी सवाल नहीं उठा कि उसे भगवान जैसा दर्जा क्यों दिया जाता है।
लेकिन केरल के तिरुवनंतपुरम की अखिला की कहानी सुनकर यह विश्वास हिल जाता है।
18 महीने के बच्चे पर 91 चोटें
पुलिस जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, 18 महीने के बच्चे के शरीर पर 91 चोटों के निशान पाए गए। आरोप है कि मां ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर बच्चे को बेरहमी से प्रताड़ित किया। यहां तक कि उसकी छाती पर पैर रखकर पसलियां तक तोड़ दीं।
इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया।
मैंने ऐसी मांएं भी देखी हैं...
मैंने अपने पड़ोस की एक महिला को अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए अपने सोने के गहने गिरवी रखते देखा है। बेटियों की शादी के लिए अपनी वर्षों की जमा पूंजी खर्च करते देखा है। अपनी छोटी-छोटी खुशियों का त्याग करते देखा है।
इसलिए कभी सोचा भी नहीं था कि मां का एक रूप ऐसा भी हो सकता है, जो अपने ही जिगर के टुकड़े की जान ले ले।
आज कोई प्रेम संबंधों के लिए, कोई निजी स्वार्थ के लिए, तो कोई पारिवारिक विवादों के कारण अपने ही बच्चों की बलि चढ़ा रहा है।
लेकिन ममता की मिसालें भी हैं...
जब ऐसे मामले सामने आते हैं तो दूसरी तरफ कुछ तस्वीरें ममता की असली परिभाषा भी याद दिलाती हैं।
मध्य प्रदेश के बरगी डैम हादसे की वह तस्वीर आज भी लोगों को भावुक कर देती है, जब मरीना मैसी का शव अपने चार साल के बेटे को सीने से लगाए हुए मिला था।
इसी तरह उत्तराखंड के चमोली में बादल फटने की घटना के बाद कांता देवी का शव अपने दोनों बच्चों को सीने से लगाए मलबे में मिला था।
इन तस्वीरों ने एक बार फिर दुनिया को बताया कि मां की ममता क्या होती है।
देश में सामने आए कुछ चौंकाने वाले मामले
- केरल में अखिला ने अपने 18 महीने के बच्चे की पसलियां तोड़ दीं।
- बेंगलुरु में एआई कंपनी की सीईओ सूचना सेठ अपने 4 साल के बेटे की हत्या के आरोप में गिरफ्तार हुई।
- आंध्र प्रदेश में प्रेम संबंधों के कारण 17 वर्षीय बेटे की हत्या का मामला सामने आया।
- तेलंगाना में रोने से परेशान होकर दो महीने के बच्चे की हत्या कर दी गई।
- त्रिपुरा में प्रेमी के साथ भागने के लिए पांच महीने के बच्चे की हत्या का आरोप लगा।
- मध्य प्रदेश में 25 दिन के नवजात की गला दबाकर हत्या की गई।
- जम्मू-कश्मीर के राजौरी में पति से बदला लेने के लिए नवजात बेटी की हत्या का मामला सामने आया।
- गाजियाबाद में सौतेली मां ने दूध मांगने पर 3 साल की बच्ची को मार डाला।
- राजस्थान के खैरथल-तिजारा में मायके जाने की जिद के चलते 8 महीने की बच्ची की हत्या का आरोप लगा।
सबसे बड़ा सवाल
इन घटनाओं को सुनते ही दिमाग एक ही सवाल पूछता है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं जो एक मां को अपने ही बच्चे की जान लेने पर मजबूर कर देती हैं?
क्या यह मानसिक बीमारी का मामला है? क्या सामाजिक दबाव इसकी वजह है? क्या रिश्तों की जटिलताएं या बढ़ता स्वार्थ इसके पीछे जिम्मेदार हैं?
सवाल बहुत बड़े हैं और इनके जवाब तलाशना समाज, परिवार और व्यवस्था तीनों की जिम्मेदारी है।
क्योंकि जब ममता पर ही सवाल उठने लगें, तो यह सिर्फ एक अपराध नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय बन जाता है।