2029 से पहले बदल सकता है देश का चुनावी नक्शा! परिसीमन पर सहमति बनाने में जुटी केंद्र सरकार
केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले परिसीमन प्रक्रिया पूरी करने की संभावनाओं पर काम कर रही है।
देश की राजनीति में आने वाले वर्षों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया को पूरा करने की संभावनाओं पर गंभीरता से काम कर रही है। सरकारी सूत्रों के अनुसार इस दिशा में राजनीतिक सहमति बनाने की कवायद शुरू हो चुकी है और विभिन्न क्षेत्रीय दलों से बातचीत का दौर भी चल रहा है।
अगर यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो देश में दशकों बाद संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों का बड़े स्तर पर पुनर्गठन देखने को मिल सकता है। इसका सीधा असर लोकसभा सीटों के वितरण, राज्यों के प्रतिनिधित्व और देश की चुनावी राजनीति पर पड़ने की संभावना है।
राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश
सरकारी सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार किसी भी विधायी कदम से पहले व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने पर जोर दे रही है। इसी उद्देश्य से विभिन्न क्षेत्रीय दलों और राजनीतिक हितधारकों के साथ परामर्श प्रक्रिया शुरू की गई है।
सूत्रों का कहना है कि जिन प्रमुख दलों से अब तक चर्चा की गई है उनमें तमिलनाडु की डीएमके और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस शामिल हैं। इसके अलावा अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ भी बातचीत जारी है।
सरकार का मानना है कि परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर व्यापक सहमति के बिना आगे बढ़ना राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए पहले सभी पक्षों की चिंताओं और सुझावों को समझने की कोशिश की जा रही है।
आखिर क्या है परिसीमन?
परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं तय की जाती हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व संतुलित रहे।
वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों का आवंटन काफी हद तक 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है। लंबे समय से सीटों के पुनर्वितरण पर रोक लगी हुई थी ताकि परिवार नियोजन में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को नुकसान न हो।
अब यदि नई परिसीमन प्रक्रिया लागू होती है तो कई राज्यों की सीटों की संख्या और राजनीतिक प्रभाव में बदलाव संभव माना जा रहा है।
दक्षिणी राज्यों की चिंता भी समझ रही सरकार
सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार उन राज्यों की चिंताओं को भी गंभीरता से समझ रही है जिन्होंने पिछले कई दशकों में जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
दक्षिण भारत के कई राज्यों ने पहले ही आशंका जताई है कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण हुआ तो उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो सकती है, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को फायदा मिल सकता है।
इसी वजह से केंद्र सरकार एक ऐसे फॉर्मूले पर काम कर रही है जो निष्पक्ष प्रतिनिधित्व और राज्यों की चिंताओं के बीच संतुलन बना सके।
सरकार क्यों नहीं चाहती विवाद?
सरकारी सूत्रों का मानना है कि परिसीमन देश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं में से एक है। ऐसे में यदि इसे राजनीतिक टकराव का विषय बनने दिया गया तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि सरकार "सहमति आधारित मॉडल" पर जोर दे रही है ताकि किसी भी राज्य या राजनीतिक दल को यह महसूस न हो कि उसके हितों की अनदेखी की गई है।
सूत्रों के अनुसार चर्चा का मुख्य फोकस निष्पक्ष प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को बनाए रखते हुए सभी पक्षों की चिंताओं का समाधान निकालना है।
क्षेत्रीय दलों के साथ बातचीत सकारात्मक
सरकारी सूत्रों ने दावा किया है कि अब तक क्षेत्रीय दलों के साथ हुई बातचीत सकारात्मक रही है। सरकार को उम्मीद है कि व्यापक चर्चा और संवाद के जरिए ऐसा ढांचा तैयार किया जा सकेगा जिस पर अधिकांश राजनीतिक दल सहमत हों।
बताया जा रहा है कि परामर्श प्रक्रिया पूरी होने और पर्याप्त राजनीतिक सहमति बनने के बाद केंद्र सरकार इस संबंध में नया विधेयक लाने पर विचार कर सकती है।
2029 चुनाव से पहले बड़ा बदलाव संभव
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार समय रहते सहमति बनाने में सफल रहती है तो 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।
ऐसा होने पर देश का चुनावी नक्शा बदल सकता है। कई राज्यों की लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ सकती है, कुछ राज्यों का राजनीतिक प्रभाव बदल सकता है और संसद में प्रतिनिधित्व का नया समीकरण देखने को मिल सकता है।
यही वजह है कि आने वाले समय में परिसीमन का मुद्दा देश की राजनीति के सबसे अहम विषयों में शामिल हो सकता है।