डीके शिवकुमार को मिली सीएम की कुर्सी, लेकिन ‘पतंग’ की डोर अब भी किसी और के हाथों में!
कर्नाटक में डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कांग्रेस के अहम फैसलों में सिद्धारमैया का प्रभाव साफ नजर आ रहा है।
नई दिल्ली। कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद डीके शिवकुमार को भले ही सत्ता की कमान मिल गई हो, लेकिन राज्य की राजनीति में कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन की तस्वीर अब भी जटिल बनी हुई है। हालात ऐसे हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बावजूद कई अहम फैसलों में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि कांग्रेस आलाकमान ने डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री पद देकर जिम्मेदारी तो सौंप दी, लेकिन बड़े फैसलों की डोर अभी भी केंद्रीय नेतृत्व और वरिष्ठ नेताओं के हाथों में ही है। यही कारण है कि राज्य में लिए जा रहे कई निर्णय “आम सहमति” के आधार पर बताए जा रहे हैं।
विधान परिषद और संगठनात्मक फैसले
डीके शिवकुमार के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद ही कांग्रेस ने कर्नाटक विधान परिषद के चार उम्मीदवारों और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के नामों की घोषणा की। इन नामों को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग खेमों की पसंद साफ नजर आई।
सूत्रों के अनुसार, टी. कमकनूर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की पसंद माने जाते हैं, जबकि पी.वी. मोहन संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के करीबी बताए जाते हैं। वहीं शिवन्ना मालवल्ली को पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का समर्थक माना जा रहा है। इसके अलावा बी.के. हरिप्रसाद को एक बार फिर विधान परिषद का उम्मीदवार बनाया गया, क्योंकि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा भी थी।
प्रदेश अध्यक्ष को लेकर रणनीति
बी.के. हरिप्रसाद को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने को भी अहम राजनीतिक कदम माना जा रहा है। उन्हें डीके शिवकुमार का राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। ओबीसी समुदाय से आने वाले 71 वर्षीय हरिप्रसाद लंबे समय से कांग्रेस संगठन में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं और दिल्ली नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं।
सूत्रों के मुताबिक, उनकी नियुक्ति में सिद्धारमैया और राज्य प्रभारी रणदीप सुरजेवाला की महत्वपूर्ण भूमिका रही। हरिप्रसाद को संगठनात्मक अनुभव और केंद्रीय नेतृत्व से निकटता के कारण यह जिम्मेदारी दी गई।
उप मुख्यमंत्री पद पर भी सिद्धारमैया की भूमिका
राज्य में मंत्रिमंडल गठन के दौरान भी सिद्धारमैया का प्रभाव देखने को मिला। दलित नेता जी. परमेश्वर को उप मुख्यमंत्री बनाए जाने के पीछे भी सिद्धारमैया की अहम भूमिका बताई जा रही है।
सूत्रों का कहना है कि सिद्धारमैया एक से अधिक उप मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में थे, जबकि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार इस पद के विरोध में थे। अंततः वरिष्ठता और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए जी. परमेश्वर को उप मुख्यमंत्री बनाया गया।
राजनीतिक संतुलन की चुनौती
कर्नाटक कांग्रेस में मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि डीके शिवकुमार के लिए मुख्यमंत्री पद संभालना जितना सम्मानजनक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। पार्टी के भीतर विभिन्न गुटों और नेताओं के प्रभाव के बीच संतुलन बनाए रखना उनके लिए बड़ी परीक्षा बन गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में कांग्रेस के भीतर यह शक्ति संतुलन कर्नाटक की राजनीति की दिशा तय करेगा।