जिंदा इंसान में ‘उतरी’ पुरखों की आत्मा: महिला की मौत के 10 दिन बाद गांववालों ने पूछा- उसे कब ले जाओगे?
वायनाड के घने जंगलों में रहने वाली अडिया जनजाति आज भी पुरखों की आत्माओं से संवाद करने का दावा करती है। ‘पैलेय’ रस्म में कंबल में लिपटा एक बुजुर्ग आत्माओं का माध्यम बनता है और गांव वाले उससे मौत, बीमारी, फसल और भविष्य तक के सवाल पूछते हैं। दैनिक जीवन, आस्था, परंपरा और रहस्य से भरी अडिया समुदाय की अनसुनी कहानी।
सुबह के ठीक 9 बजे थे। वायनाड के घने जंगलों में उमस और गर्मी के बीच पथरीले रास्तों पर हमारे कदम लगातार बढ़ रहे थे। करीब 40 मिनट तक जंगल के उबड़-खाबड़ रास्तों को पार करने के बाद कुछ घर नजर आने लगे। जैसे-जैसे हम करीब पहुंचे, एक घर के आंगन में जुटी भीड़ दिखाई दी। आंगन के एक ओर महिलाएं चुपचाप बैठी थीं, दूसरी तरफ पुरुष। तीन लोग किसी डमरू जैसे वाद्य यंत्र और घुंघरू की धीमी थाप बजा रहे थे। जंगल के सन्नाटे में गूंजती वह आवाज माहौल को और रहस्यमयी बना रही थी। तभी नजर आंगन के बीचोंबीच बैठे एक शख्स पर पड़ी। झुलसा देने वाली गर्मी में वह सिर से पैर तक मोटे कंबल में कसकर लिपटा हुआ था। शरीर का एक भी हिस्सा दिखाई नहीं दे रहा था। अचानक कंबल जोर-जोर से हिलने लगा। भीतर से अजीब आवाजें आने लगीं। आसपास बैठे लोग टकटकी लगाए उसे देख रहे थे। लोगों का दावा था “अब इसमें पुरखों की आत्मा आने वाली है।” यह दृश्य केरल के वायनाड जंगलों में रहने वाली अडिया जनजाति का था, जिसकी आबादी करीब 12 हजार मानी जाती है। सदियों पुरानी परंपराओं और रहस्यमयी मान्यताओं के बीच जीने वाला यह समुदाय आज भी आधुनिक दुनिया से काफी दूर है।
‘पैलेय’ रस्म: जब आत्माओं को बुलाया जाता है
मेरे साथ मौजूद थे अजयन, जो जंगलों में टूरिज्म का काम करते हैं और अडिया समुदाय की भाषा व परंपराओं को समझते हैं। उन्होंने बताया, “यह चेकाड़ी गांव है। यहां अडिया समुदाय की ‘पैलेय’ रस्म चल रही है। इस दौरान पुरखों की आत्माओं को बुलाने का दावा किया जाता है।” कंबल में लिपटा व्यक्ति लगातार हिल रहा था। वाद्य यंत्र ‘मुरथम’ की थाप जैसे-जैसे तेज या धीमी होती, उसके शरीर की हरकत भी उसी हिसाब से बदल जाती। कुछ देर बाद वह भारी आवाज में बोलने लगा। उसके सामने बैठे एक बुजुर्ग उससे अपनी भाषा में सवाल पूछ रहे थे और वह जवाब दे रहा था। धीरे-धीरे आसपास बैठे बाकी लोग भी अपनी परेशानियां बताने लगे। कोई बीमारी का कारण पूछ रहा था, कोई घर की कलह का हल।
40 साल की महिला की मौत और आत्मा से सवाल
अजयन ने बताया कि यह रस्म एक महिला की मौत के बाद की जा रही थी।
करीब 10 दिन पहले इसी घर में 40 साल की चिक्की नाम की महिला ने आत्महत्या कर ली थी। गांव वालों का मानना था कि उसकी आत्मा अभी भी घर के आसपास भटक रही है। अडिया समुदाय की मान्यता है कि मौत के बाद 42 दिनों तक आत्मा घर के आसपास रहती है। इसी दौरान कभी भी ‘पैलेय’ रस्म की जाती है। बुजुर्गों ने आत्माओं से पूछा “चिक्की ने खुदकुशी क्यों की?” कंबल में बैठे व्यक्ति ने जवाब दिया कि महिला लंबे समय से तनाव में थी और परिवार के व्यवहार से परेशान होकर उसने यह कदम उठाया। अडिया समुदाय मानता है कि पूर्वजों की आत्माएं मृत आत्मा को रास्ता दिखाने आती हैं ताकि वह भटकती न रहे।
मुरथम की थाप के बिना नहीं आती आत्माएं
अजयन बताते हैं कि अडिया समाज में ‘मुरथम’ सिर्फ वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि आत्माओं को बुलाने का माध्यम माना जाता है।
हर अवसर के लिए इसकी आवाज अलग होती है:
- विवाह के लिए अलग थाप
- मृत्यु के लिए अलग
- त्योहारों के लिए अलग
- और आत्माओं को बुलाने के लिए अलग
उनका मानना है कि बिना मुरथम और घुंघरू के कोई भी आध्यात्मिक आयोजन पूरा नहीं होता।
पत्थर ही मंदिर, पुरखे ही भगवान
रस्म खत्म होने के बाद हमें घर के अंदर ले जाया गया। मिट्टी के चूल्हे पर खाना बन रहा था। दीवारों पर हाथ से बनी पेंटिंग थीं। कमरे के एक कोने में एक साधारण पत्थर रखा था। मैंने पूछा, “क्या यही मंदिर है?” अजयन बोले, “हां, अडिया लोग मूर्तियों की पूजा नहीं करते। यह पत्थर ही इनके पुरखों और रक्षक का प्रतीक है।” यह समुदाय प्रकृति और पूर्वजों को ही सबसे बड़ी शक्ति मानता है।
महिलाओं का पहनावा और परंपराएं
अडिया महिलाओं का पहनावा आज भी पारंपरिक है। कई महिलाएं बिना ब्लाउज के साड़ी पहनती हैं, जबकि कुछ साड़ी के पल्लू को ही ब्लाउज की तरह लपेटती हैं।
उनके गहने भी बेहद खास होते हैं:
- बीज और कंद-मूल से बने हार
- पुराने सिक्कों की मालाएं
- पीतल और धातु के झुमके
- हाथों में मोटे कंगन
‘कलमाला’ नाम का हार यहां खास माना जाता है, जिसे रंग-बिरंगे मोतियों और बीजों से बनाया जाता है। पुरुष ‘मुंडू’ पहनते हैं और पारंपरिक आभूषण धारण करते हैं।
कुट्टम त्योहार: जब पुरखों की आत्माएं करती हैं न्याय
अडिया समुदाय का सबसे बड़ा त्योहार ‘कुट्टम’ है, जिसे फसल कटाई के बाद मनाया जाता है। इस दौरान पूरा गांव एक जगह इकट्ठा होता है। नई फसल से भोजन बनाकर पुरखों की आत्माओं को अर्पित किया जाता है। समुदाय का विश्वास है कि इस समय पुजारी के शरीर में पुरखों की आत्माएं उतरती हैं। गांव के विवाद, झगड़े और फैसले उन्हीं के सामने रखे जाते हैं। पुजारी जो फैसला सुनाता है, उसे अंतिम माना जाता है।
गाधिका अनुष्ठान: बीमारी भगाने की रस्म
अडिया लोग ‘गाधिका’ नाम का विशेष अनुष्ठान भी करते हैं। यह रस्म बीमारी और बुरी आत्माओं को दूर भगाने के लिए होती है। इसमें पुरुष और महिलाएं रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े पहनकर गीत-संगीत पर नाचते हैं।अनुष्ठान के अंत में पुजारी बीमार व्यक्ति के पास जाकर मंत्र पढ़ता है और पुरखों से गांव की रक्षा की प्रार्थना करता है।
शादी की अनोखी परंपरा
अडिया समुदाय की शादी भी बेहद अलग होती है। ये लोग मंदिर में मूर्ति के सामने नहीं, बल्कि पत्थर के प्रतीक के सामने विवाह करते हैं। शादी से एक रात पहले मंदिर में तुलसी की दो मालाएं रखी जाती हैं।अगले दिन दूल्हा-दुल्हन बुजुर्गों के सामने एक-दूसरे को वही माला पहनाते हैं। इसी रस्म को ‘थापूकोडी’ कहा जाता है। दहेज में लड़की पक्ष अनाज और नारियल देता है।
जंगल, हाथी और बाहरी दुनिया से दूरी
शाम होते-होते हमें गांव से वापस लौटना था। अजयन ने बताया कि अडिया लोग बाहरी लोगों से जल्दी घुलते-मिलते नहीं हैं। जंगल में प्रवेश के लिए वन विभाग से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। उन्होंने कहा, “यह इलाका हाथियों के लिए मशहूर है। रात होते ही हाथियों के झुंड निकलते हैं, इसलिए यहां सख्त निगरानी रहती है।” करीब 40 मिनट जंगल पार करने के बाद हम उस जगह पहुंचे जहां वन विभाग की गाड़ी खड़ी थी। जंगल पीछे छूट चुका था, लेकिन अडिया समुदाय की रहस्यमयी दुनिया लंबे समय तक दिमाग में गूंजती रही जहां आज भी लोग पुरखों की आत्माओं से अपने जीवन के सवाल पूछते हैं।