खुदीराम बोस: 18 साल की उम्र में स्वतंत्रता के लिए फांसी पर चढ़े वीर क्रांतिकारी

खुदीराम बोस, 18 साल की उम्र में 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर बम कांड के बाद फांसी पर चढ़ गए। इस युवा क्रांतिकारी ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी और स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित किया। उनकी शहादत आज भी देशभक्ति और बलिदान का प्रतीक है।

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TEAM KHATAK Verified Media or Organization • 11 Jun, 2026 Editor
August 11, 2025 • 6:12 PM  21
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खुदीराम बोस: 18 साल की उम्र में स्वतंत्रता के लिए फांसी पर चढ़े वीर क्रांतिकारी
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11 Aug 2025
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खुदीराम बोस: 18 साल की उम्र में स्वतंत्रता के लिए फांसी पर चढ़े वीर क्रांतिकारी
आज 11 अगस्त, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वीर सपूत खुदीराम बोस की शहादत का दिन है। मात्र 18 साल की उम्र में खुदीराम ने भारत की आजादी के लिए फांसी का फंदा स्वीकार किया। 1908 में मुजफ्फरपुर बम कांड में ब्रिटिश शासन को चुनौती देने वाले इस युवा क्रांतिकारी की वीरता आज भी लाखों भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

मुजफ्फरपुर बम कांड

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में हुआ था। 1908 में, 18 साल की उम्र में, उन्होंने प्रफुल्ल चाकी के साथ मिलकर मुजफ्फरपुर में ब्रिटिश जज किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने की योजना बनाई। किंग्सफोर्ड की कठोर सजा देने की नीति ने क्रांतिकारियों को आक्रोशित कर दिया था। 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम और प्रफुल्ल ने उनकी गाड़ी पर बम फेंका, लेकिन गलती से दो ब्रिटिश महिलाओं की मौत हो गई। इस घटना ने ब्रिटिश शासन को हिलाकर रख दिया।

गिरफ्तारी और फांसी

बम कांड के बाद प्रफुल्ल चाकी ने आत्महत्या कर ली, लेकिन खुदीराम को वैनी स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमे के दौरान खुदीराम ने साहस के साथ अपनी क्रांतिकारी विचारधारा का बचाव किया। 11 अगस्त 1908 को, मात्र 18 साल की उम्र में, उन्हें मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दे दी गई। फांसी के समय उनके चेहरे पर कोई डर नहीं था, और वे “वंदे मातरम्” का नारा लगाते हुए शहीद हो गए।

क्रांतिकारी जीवन और प्रेरणा

खुदीराम बोस ने कम उम्र में ही अनुशीलन समिति में शामिल होकर क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया। स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ वे देशभक्ति और स्वतंत्रता के लिए समर्पित थे। उनकी नन्ही उम्र में दिखाई गई वीरता ने बंगाल और पूरे भारत में क्रांतिकारी आंदोलन को नई ऊर्जा दी। उनकी शहादत ने भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों को प्रेरित किया।

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

खुदीराम की शहादत को याद करने के लिए हर साल 11 अगस्त को बंगाल और देश के कई हिस्सों में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। मिदनापुर में उनके नाम पर स्मारक और स्कूल स्थापित किए गए हैं। उनकी कहानी न केवल स्वतंत्रता संग्राम की बलिदानी भावना को दर्शाती है, बल्कि आज के युवाओं को देश के लिए समर्पण का संदेश भी देती है।

आज का संदेश

खुदीराम बोस की शहादत हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की कीमत अनगिनत बलिदानों से चुकाई गई है। उनकी वीरता और साहस आज भी हमें यह सिखाते हैं कि उम्र कोई बाधा नहीं होती जब बात देश के लिए कुछ करने की हो। उनकी कहानी स्कूलों और इतिहास की किताबों में अमर है।

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