कहीं टकराव तो कहीं तरक्की! 65 IAS ट्रांसफर के पीछे क्या है असली खेल?

राजस्थान में भजनलाल सरकार ने 12 दिनों में दूसरी बार बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए 65 IAS अधिकारियों के तबादले किए हैं। इस बदलाव से संकेत मिलता है कि जनप्रतिनिधियों से टकराव में आए अफसरों को हटाया गया, जबकि कामकाजी अफसरों को अहम पद दिए गए। प्रतापगढ़, सीकर और जैसलमेर जैसे मामलों में विवादों का असर तबादलों में साफ दिखा। यह घटनाक्रम राज्य में अफसरों और नेताओं के बीच बढ़ते टकराव और सत्ता संतुलन की स्थिति को दर्शाता है।

Apr 1, 2026 - 16:39
कहीं टकराव तो कहीं तरक्की! 65 IAS ट्रांसफर के पीछे क्या है असली खेल?

राजस्थान 1 अप्रैल 2026 :- राजस्थान में भजनलाल सरकार ने महज 12 दिनों के भीतर दूसरी बार बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए 65 आईएएस अफसरों के तबादले कर दिए हैं। इससे पहले 19 मार्च को भी 25 अफसरों को इधर-उधर किया गया था। लगातार हो रहे इन बदलावों ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में नए संकेत दिए हैं।

इस पूरी तबादला सूची को देखें तो साफ तौर पर दो बड़े ट्रेंड सामने आते हैं—पहला, जनप्रतिनिधियों से टकराव में आए अफसरों को हटाया गया है। दूसरा, कामकाजी और “सिस्टम फ्रेंडली” अफसरों को अहम पदों पर मौका दिया गया है।

जनप्रतिनिधि बनाम अफसर: क्यों बढ़ रहे टकराव?

राजस्थान में पिछले कुछ महीनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां सांसद, मंत्री या विधायक और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच खुला टकराव देखने को मिला। इन विवादों का असर अब तबादला सूची में भी साफ दिख रहा है।

1. उदयपुर सांसद और कलेक्टर का विवाद, संसद तक पहुंचा मामला

प्रतापगढ़ की पूर्व कलेक्टर डॉ. अंजलि राजोरिया और उदयपुर सांसद मन्नालाल रावत के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि मामला संसद तक पहुंच गया।

सांसद ने आरोप लगाया कि जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) के तहत स्वीकृत 50 से ज्यादा विकास कार्यों को कलेक्टर ने जानबूझकर रोक रखा। उनका कहना था कि फंड स्वीकृत होने के बावजूद काम आगे नहीं बढ़ाया गया, जिससे विकास कार्य प्रभावित हुए।

इस विवाद के बाद अंजलि राजोरिया को कलेक्टर पद से हटाकर गृह विभाग में संयुक्त सचिव बना दिया गया है, जबकि उनकी जगह शुभम चौधरी को प्रतापगढ़ का नया कलेक्टर नियुक्त किया गया है।

2. मंत्री से टकराव के बाद भी बढ़ा मुकुल शर्मा का कद

सीकर में वन मंत्री संजय शर्मा और तत्कालीन कलेक्टर मुकुल शर्मा के बीच सार्वजनिक विवाद हुआ था। एक सेवा शिविर में अव्यवस्था को लेकर मंत्री नाराज हो गए थे और कलेक्टर के सामने ही अधिकारियों को लेकर सख्त टिप्पणी की थी।

हालांकि, इस विवाद के बावजूद मुकुल शर्मा को सजा नहीं बल्कि “रिवॉर्ड” मिला। उन्हें अब मुख्यमंत्री के विशिष्ट सचिव के रूप में नियुक्त किया गया है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि सरकार सिर्फ विवाद नहीं, बल्कि अफसर की कार्यशैली को भी महत्व दे रही है।

3. जैसलमेर कलेक्टर पर RAS एसोसिएशन का दबाव

जैसलमेर के कलेक्टर प्रताप सिंह को भी पद से हटाया गया है। उन्हें सचिवालय में संयुक्त शासन सचिव (वित्त व्यय) बनाया गया है। उनकी जगह अनुपमा जोरवाल को नया कलेक्टर नियुक्त किया गया है।

प्रताप सिंह के खिलाफ आरएएस एसोसिएशन ने मोर्चा खोल दिया था। आरोप थे कि वे अधीनस्थ अधिकारियों के साथ अनुचित व्यवहार करते हैं और नियमों के खिलाफ दबाव बनाते हैं।

एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की थी, जिसके बाद यह फैसला लिया गया।

4. विवादों के बावजूद अहम जिम्मेदारी—आशीष मोदी बने कलेक्टर

आशीष मोदी, जो पहले सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग में निदेशक थे, अब सीकर के कलेक्टर बनाए गए हैं।

उनके कार्यकाल के दौरान एक आदेश जारी हुआ था, जिसमें ज्यादा बिजली बिल वाले पेंशनधारकों की जांच और भुगतान रोकने की बात कही गई थी। इससे विवाद पैदा हुआ और बाद में मंत्री को सफाई देनी पड़ी थी।

इसके बावजूद उन्हें जिला कलेक्टर जैसे अहम पद पर नियुक्त किया गया है।

क्या ब्यूरोक्रेसी हावी हो रही है?

लगातार हो रहे इन फेरबदल और विवादों को देखते हुए बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या राजस्थान में ब्यूरोक्रेसी ज्यादा प्रभावी हो रही है या फिर जनप्रतिनिधियों का दबाव बढ़ रहा है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह टकराव “पावर बैलेंस” का हिस्सा है—जहां जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हैं, वहीं अफसर प्रशासनिक नियमों और प्रक्रियाओं के तहत काम करते हैं। जब दोनों के बीच समन्वय नहीं बनता, तो टकराव सामने आता है।

सरकार का क्या है संदेश?

तबादला सूची से सरकार का एक स्पष्ट संदेश निकलकर आता है—

विवादों में घिरे अफसरों को हटाया जाएगा

काम करने वाले अफसरों को जिम्मेदारी मिलेगी

प्रशासन और राजनीति के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश होगी

राजस्थान में लगातार हो रहे प्रशासनिक फेरबदल सिर्फ रूटीन प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव का संकेत हैं। यह बदलाव इस बात को तय करेगा कि आने वाले समय में प्रदेश में शासन की दिशा कैसी होगी—क्या अफसर हावी होंगे या जनप्रतिनिधियों की भूमिका और मजबूत होगी।

फिलहाल इतना तय है कि राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति के बीच यह खींचतान आने वाले दिनों में और दिलचस्प मोड़ ले सकती है।