नाबालिग रेप पीड़िता मामले में हाईकोर्ट का अहम आदेश, गर्भपात को मिली मंजूरी!
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने 16 वर्षीय नाबालिग रेप पीड़िता को गर्भपात की अनुमति दी है। पीड़िता करीब 7 महीने (27 सप्ताह 4 दिन) की गर्भवती है। मेडिकल बोर्ड ने खून की कमी और गर्भ की अवधि अधिक होने के कारण गर्भपात को जोखिमपूर्ण बताया था, लेकिन अदालत ने सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अनुमति प्रदान की।
जोधपुर:राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक महत्वपूर्ण मामले में 16 वर्षीय नाबालिग रेप पीड़िता को गर्भपात की अनुमति प्रदान की है। यह मामला इसलिए भी संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि पीड़िता लगभग 27 सप्ताह 4 दिन यानी करीब सात महीने की गर्भवती है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने मेडिकल रिपोर्ट और पीड़िता की स्वास्थ्य स्थिति से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को रखा गया।
मामले में पीड़िता की ओर से गर्भ समापन की अनुमति के लिए याचिका दायर की गई थी। अदालत ने सुनवाई के दौरान एक मेडिकल बोर्ड से पीड़िता की स्थिति पर रिपोर्ट मांगी थी, ताकि चिकित्सकीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जा सके।
मेडिकल बोर्ड ने जताई थी चिंता
मेडिकल बोर्ड की जांच में सामने आया कि पीड़िता में खून की कमी (एनीमिया) की समस्या पाई गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गर्भावस्था काफी आगे बढ़ चुकी है, ऐसे में इस स्तर पर गर्भपात की प्रक्रिया चिकित्सा की दृष्टि से जोखिमपूर्ण हो सकती है। डॉक्टरों ने संभावित स्वास्थ्य खतरों को लेकर अपनी राय अदालत के सामने रखी थी।
हालांकि अदालत ने मामले की परिस्थितियों, पीड़िता की उम्र, मानसिक स्थिति और अन्य उपलब्ध तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अपना फैसला सुनाया।
अदालत ने सभी पहलुओं पर किया विचार
एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान यह माना कि ऐसे मामलों में केवल चिकित्सकीय पहलू ही नहीं, बल्कि पीड़िता की मानसिक स्थिति, सामाजिक परिस्थितियां और भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने गर्भपात की अनुमति देने का आदेश पारित किया।
संवेदनशील मामलों में बढ़ी कानूनी और सामाजिक बहस
नाबालिग पीड़िताओं से जुड़े मामलों में गर्भ समापन को लेकर अक्सर कानूनी, चिकित्सकीय और सामाजिक स्तर पर चर्चा होती रही है। विशेष रूप से जब गर्भावस्था उन्नत चरण में पहुंच चुकी हो, तब अदालतों को चिकित्सा रिपोर्ट और पीड़िता के हितों के बीच संतुलन बनाते हुए फैसला देना पड़ता है।
यह मामला भी उन्हीं संवेदनशील मामलों में शामिल हो गया है, जहां न्यायालय ने परिस्थितियों और पीड़िता के हितों को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण आदेश दिया।