रविंद्र भाटी के आंदोलन का असर? गिरल माइंस विवाद के बीच शिव क्षेत्र को मिले 4 नए ट्यूबवेल
बाड़मेर के गिरल माइंस आंदोलन के 47वें दिन बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। मजदूरों और ट्रक ऑपरेटरों की मांगों को लेकर धरने पर बैठे विधायक रविंद्र सिंह भाटी के क्षेत्र शिव में सरकार ने ₹78.48 लाख की लागत से 4 नए ट्यूबवेल मंजूर किए हैं।
बाड़मेर। राजस्थान के बाड़मेर जिले में गिरल लिग्नाइट माइंस को लेकर चल रहा आंदोलन अब सिर्फ मजदूरों और ट्रक ऑपरेटरों की मांगों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। सरहदी इलाके शिव से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी पिछले डेढ़ महीने से अधिक समय से आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं और लगातार सरकार तथा प्रशासन पर स्थानीय लोगों की उपेक्षा के आरोप लगा रहे हैं।
इसी बीच आंदोलन के 47वें दिन एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने पूरे मामले को नया राजनीतिक मोड़ दे दिया है। राज्य सरकार ने शिव विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट को देखते हुए करीब ₹78.48 लाख की लागत से 4 नए ट्यूबवेलों की स्वीकृति प्रदान कर दी है। यह आदेश जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) मुख्यालय, जयपुर से जारी किया गया है।
47 दिन से जारी है गिरल माइंस आंदोलन
गिरल लिग्नाइट माइंस क्षेत्र में स्थानीय श्रमिक और ट्रक ऑपरेटर लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं। उनका आरोप है कि माइंस प्रबंधन और ठेका कंपनियां श्रम कानूनों की अनदेखी कर रही हैं और मजदूरों का शोषण किया जा रहा है।
आंदोलन को मजबूती देने के लिए विधायक रविंद्र सिंह भाटी स्वयं धरना स्थल पर मौजूद हैं और लगातार श्रमिकों के समर्थन में आवाज उठा रहे हैं। भीषण गर्मी और कठिन परिस्थितियों के बावजूद धरना जारी है।
जब आंदोलन में आया आत्मदाह का मोड़
आंदोलन के शुरुआती चरण में प्रशासन की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर हालात उस समय बेहद गंभीर हो गए थे, जब विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने विरोध स्वरूप खुद पर पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह का प्रयास किया था।
इस घटना ने पूरे प्रदेश का ध्यान गिरल माइंस आंदोलन की ओर खींच लिया था और सरकार पर दबाव बढ़ गया था।
खून से लिखी गई थी अमित शाह को चिट्ठी
आंदोलन के 46वें दिन रविवार को प्रदर्शनकारी श्रमिकों और विधायक भाटी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को खून से पत्र लिखकर अपनी मांगों से अवगत कराया था।
पत्र में दावा किया गया था कि गिरल माइंस में श्रमिकों से 12-12 घंटे तक काम कराया जा रहा है, जो श्रम कानूनों के खिलाफ है। इसके साथ ही मजदूरों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिलने का मुद्दा भी उठाया गया था। इस पत्र के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
सरकार ने जारी किया बड़ा आदेश
अमित शाह को खून से लिखे पत्र के कुछ ही समय बाद PHED मुख्यालय जयपुर से एक महत्वपूर्ण आदेश जारी हुआ। आदेश के अनुसार शिव विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट को दूर करने के लिए 4 नए ट्यूबवेलों के निर्माण की प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति प्रदान की गई है।
इन परियोजनाओं पर लगभग ₹78.48 लाख खर्च किए जाएंगे। विभागीय अधिकारियों को जल्द कार्य शुरू करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
क्या हैं आंदोलनकारियों की मुख्य मांगें?
गिरल माइंस क्षेत्र में आंदोलन कर रहे श्रमिकों और ट्रक ऑपरेटरों की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं—
- श्रमिकों से 12 घंटे की बजाय कानून के अनुसार 8 घंटे काम लिया जाए।
- ओवरटाइम का उचित भुगतान किया जाए।
- श्रमिकों को सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाएं।
- खदान क्षेत्र में शुद्ध पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाएं दी जाएं।
- स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता मिले।
- ट्रक ऑपरेटरों के हितों की सुरक्षा की जाए।
सरकार की सौगात या राजनीतिक रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आंदोलन के बीच अचानक शिव क्षेत्र के लिए बड़ी पेयजल परियोजनाओं की स्वीकृति महज संयोग नहीं हो सकती।
विशेषज्ञों के अनुसार सरकार एक तरफ क्षेत्रीय विकास का संदेश देना चाहती है, वहीं दूसरी ओर बढ़ते आंदोलन और उससे पैदा हो रहे राजनीतिक दबाव को भी संतुलित करने का प्रयास कर रही है।
रविंद्र सिंह भाटी वर्तमान में राजस्थान के युवाओं और ग्रामीण इलाकों में एक प्रभावशाली नेता के रूप में उभर रहे हैं। ऐसे में गिरल माइंस आंदोलन को लेकर सरकार की हर कार्रवाई राजनीतिक नजरिए से भी देखी जा रही है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल गिरल माइंस आंदोलन जारी है और आंदोलनकारी अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। दूसरी तरफ सरकार ने शिव क्षेत्र में विकास कार्यों की शुरुआत कर एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत का रास्ता निकलेगा या फिर यह संघर्ष आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक रूप लेगा।