अजमेर के ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ पर नया विवाद, हिंदू सेना ने की वैज्ञानिक सर्वे की मांग; बताया प्राचीन संस्कृत महाविद्यालय
अजमेर स्थित ऐतिहासिक स्मारक ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ एक बार फिर चर्चा में है। हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने केंद्र सरकार से आधुनिक तकनीक के जरिए वैज्ञानिक सर्वे कराने और इसे मूल स्वरूप ‘सरस्वती कंठाभरण संस्कृत महाविद्यालय’ के रूप में मान्यता देने की मांग की है।
अजमेर। राजस्थान के ऐतिहासिक शहर अजमेर में स्थित विश्व प्रसिद्ध स्मारक ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को पत्र लिखकर इस ऐतिहासिक परिसर का आधुनिक तकनीक के माध्यम से वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने की मांग की है। साथ ही उन्होंने दावा किया है कि यह स्थल मूल रूप से चौहानकालीन ‘सरस्वती कंठाभरण संस्कृत महाविद्यालय’ था, जिसे बाद में मस्जिद का स्वरूप दिया गया।
इस मांग के बाद एक बार फिर ऐतिहासिक धरोहर, सांस्कृतिक विरासत और पुरातात्विक तथ्यों को लेकर बहस तेज हो गई है। हिंदू सेना का कहना है कि यदि आधुनिक तकनीक से निष्पक्ष सर्वेक्षण कराया जाए तो इस परिसर के मूल स्वरूप से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।
ऐतिहासिक दस्तावेजों का दिया हवाला
विष्णु गुप्ता ने अपने मांग पत्र के साथ कई ऐतिहासिक संदर्भ और दस्तावेज भी भेजे हैं। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पहले महानिदेशक सर अलेक्जेंडर कनिंघम की वर्ष 1864 की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि इस परिसर का निर्माण चौहान शासक विग्रहराज चौहान (बीसलदेव) ने संस्कृत शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में करवाया था।
उनका दावा है कि यह परिसर उस दौर में विद्या, संस्कृति और वेद अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र था, जिसे बाद में आक्रमणों के दौरान परिवर्तित कर दिया गया।
खंभों पर मौजूद हैं देवी-देवताओं की आकृतियां
हिंदू सेना का कहना है कि अढ़ाई दिन का झोपड़ा परिसर में मौजूद 124 नक्काशीदार स्तंभों पर आज भी हिंदू देवी-देवताओं, कलश और अन्य धार्मिक प्रतीकों की आकृतियां देखी जा सकती हैं। संगठन का दावा है कि ये निशान इस बात के संकेत हैं कि यह संरचना मूल रूप से हिंदू स्थापत्य शैली में निर्मित थी।
विष्णु गुप्ता ने मुगलकालीन ऐतिहासिक ग्रंथ ‘मआसिर-ए-आलमगीरी’ का भी उल्लेख किया है, जिसमें कथित रूप से मंदिरों को तोड़ने से जुड़े शाही आदेशों का जिक्र मिलता है। उनके अनुसार इस परिसर के इतिहास की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
ज्ञानवापी की तर्ज पर सर्वे कराने की मांग
हिंदू सेना ने केंद्र सरकार से मांग की है कि ज्ञानवापी मामले की तरह आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक पद्धति से इस परिसर का सर्वेक्षण कराया जाए। संगठन का कहना है कि यदि सर्वेक्षण में ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि होती है तो सरकारी अभिलेखों में दर्ज ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ नाम हटाकर इसे उसके मूल नाम ‘सरस्वती कंठाभरण संस्कृत महाविद्यालय’ के रूप में दर्ज किया जाए।
संगठन का दावा है कि इससे भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर को नई पहचान मिलेगी।
सदियों पुराना इतिहास समेटे है यह स्मारक
अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह के निकट स्थित अढ़ाई दिन का झोपड़ा देश की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतों में से एक माना जाता है। इसकी स्थापत्य कला, नक्काशीदार स्तंभ और विशाल मेहराबें आज भी पर्यटकों और इतिहासकारों को आकर्षित करती हैं।
इतिहासकारों के अनुसार 11वीं शताब्दी में चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ ने यहां एक संस्कृत विद्यालय और सरस्वती मंदिर का निर्माण करवाया था। बाद में 1192 के तराइन युद्ध के पश्चात क्षेत्र पर कब्जा होने के बाद इस परिसर का स्वरूप बदला गया और इसे मस्जिद के रूप में विकसित किया गया।
नाम के पीछे भी हैं कई कहानियां
‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ नाम को लेकर भी अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। एक मत के अनुसार, इस संरचना को मस्जिद का स्वरूप देने के लिए कारीगरों को केवल ढाई दिन का समय दिया गया था, जिसके कारण इसका यह नाम पड़ा।
वहीं दूसरी मान्यता यह है कि मराठा काल में यहां सूफी संत पंजाब शाह की याद में ढाई दिन का उर्स आयोजित होता था। समय के साथ यह स्थल ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
फिर चर्चा में आया ऐतिहासिक स्मारक
अजमेर दरगाह और अढ़ाई दिन का झोपड़ा दोनों ही लंबे समय से ऐतिहासिक और धार्मिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। विष्णु गुप्ता पहले भी अजमेर दरगाह परिसर को लेकर अदालत में याचिका दायर कर चुके हैं। अब अढ़ाई दिन का झोपड़ा को लेकर की गई यह नई मांग आने वाले समय में एक बड़ा राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दा बन सकती है।
फिलहाल सभी की निगाहें केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों की संभावित प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं।