‘अरावली बची तो भविष्य बचेगा’, सुप्रीम कोर्ट की कमेटी पर बोले अशोक गहलोत
अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित 5 सदस्यीय हाई-पावर कमेटी का कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने स्वागत किया है।
जयपुर। राजस्थान और देशभर में बढ़ती गर्मी, जल संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। अरावली की परिभाषा तय करने और इससे जुड़े महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दों की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने 5 सदस्यीय हाई-पावर कमेटी का गठन किया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने स्वागत करते हुए इसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया है।
अशोक गहलोत ने कहा कि अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि राजस्थान और उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ है। यदि इसका संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में जल संकट, मरुस्थलीकरण और तापमान वृद्धि जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
गहलोत बोले- वैज्ञानिक आधार पर तय हो अरावली की परिभाषा
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए लिखा कि अरावली की परिभाषा और संरक्षण के महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित 5 सदस्यीय हाई-पावर कमेटी एक स्वागत योग्य कदम है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि यह कमेटी वैज्ञानिक तथ्यों और वर्तमान पर्यावरणीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसी परिभाषा तैयार करेगी, जो अरावली के संपूर्ण इकोसिस्टम को सुरक्षित रखने में मददगार साबित होगी।
गहलोत ने कहा कि आज देश और विशेष रूप से राजस्थान जिस तरह भीषण गर्मी, जल संकट और बदलती जलवायु परिस्थितियों का सामना कर रहा है, उसे देखते हुए अरावली का संरक्षण पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।
'पुराने मापदंड अब पर्याप्त नहीं'
अशोक गहलोत ने कहा कि एक-दो दशक पहले बनाए गए पर्यावरणीय मानक और मापदंड आज की गंभीर जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप नहीं हैं। ग्लोबल वार्मिंग, तापमान में लगातार वृद्धि और मौसम के बदलते स्वरूप को देखते हुए नई सोच और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि हाई-पावर कमेटी को अपनी रिपोर्ट तैयार करते समय वर्तमान पर्यावरण संकट, भूजल स्तर में गिरावट और जैव विविधता के संरक्षण जैसे पहलुओं को प्राथमिकता देनी चाहिए।
केंद्र सरकार की नीतियों पर साधा निशाना
अरावली संरक्षण के मुद्दे पर अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार की नीतियों की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र की नीतियों और खनन गतिविधियों के कारण अरावली के अस्तित्व पर गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ है।
गहलोत ने कहा कि इसी वजह से प्रदेशभर में 'अरावली बचाओ' जैसे जन आंदोलनों को मजबूती मिली। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट की यह पहल अरावली क्षेत्र में हो रहे पर्यावरणीय नुकसान को रोकने में मदद करेगी और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का नया रास्ता खोलेगी।
पर्यावरणविदों और नागरिकों से की अपील
पूर्व मुख्यमंत्री ने पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों, स्थानीय समुदायों और जागरूक नागरिकों से भी महत्वपूर्ण अपील की। उन्होंने कहा कि जब हाई-पावर कमेटी सुझाव आमंत्रित करने की प्रक्रिया शुरू करे, तब सभी लोग अपने सुझाव और अनुभव जरूर साझा करें।
गहलोत का मानना है कि स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना अरावली संरक्षण की कोई भी योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकती।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का आदेश?
गौरतलब है कि अरावली पर्वतमाला की परिभाषा तय करने और उससे जुड़े पर्यावरणीय विवादों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 5 सदस्यीय हाई-पावर कमेटी का गठन किया है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किया। अदालत ने कमेटी को निर्देश दिया है कि वह 31 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कमेटी अरावली क्षेत्र में हो रहे अनियंत्रित खनन, पहाड़ों की कटाई, वन क्षेत्र में कमी और पारिस्थितिकीय क्षति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों की समीक्षा करेगी।
अरावली क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?
अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल है। यह राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली हुई है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार अरावली:
- राजस्थान में मरुस्थल के विस्तार को रोकती है।
- भूजल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- जैव विविधता का प्रमुख केंद्र है।
- प्रदूषण नियंत्रण और जलवायु संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।
- लाखों लोगों की आजीविका और जल स्रोतों का आधार है।
इसी वजह से अरावली का संरक्षण केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा का भी विषय माना जा रहा है।