महिला कर्मिकों ने सीएम से मांगा रक्षाबंधन का उपहार मासिक धर्म के दौरान तीन दिन का मिले अवकाश ..

सरकारी सेवा में कार्यरत महिला कर्मचारियों ने मासिक धर्म के दौरान स्वास्थ्य और कार्यस्थल की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए तीन दिन की सवेतन छुट्टी या वर्क-फ्रॉम-होम विकल्प की मांग की है। उन्होंने इस मांग पर विचार के लिए अधिकारियों को एक ज्ञापन सौंपा है।

Jul 14, 2025 - 14:03
महिला कर्मिकों ने सीएम से मांगा रक्षाबंधन का उपहार मासिक धर्म के दौरान तीन दिन का मिले अवकाश ..

राजस्थान के झुंझुनूं जिले में राजकीय सेवा में कार्यरत महिला अधिकारियों और कर्मचारियों ने मासिक धर्म के दौरान कार्यस्थल पर विशेष सुविधाओं की मांग उठाई है। इन महिलाओं ने जिला कलक्टर अरुण गर्ग को मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपकर मासिक धर्म के दौरान तीन दिन का सवैतनिक अवकाश या इस अवधि में वर्क फ्रॉम होम की अनुमति देने की मांग की है। यह मांग न केवल कार्यस्थल पर महिलाओं के स्वास्थ्य और सुविधा को प्राथमिकता देने की दिशा में एक कदम है, बल्कि यह महिला सशक्तीकरण और कार्य-जीवन संतुलन के लिए एक महत्वपूर्ण चर्चा को भी सामने लाती है।

मांग का आधार और महत्व

मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसके दौरान कई महिलाओं को शारीरिक और मानसिक असुविधा का सामना करना पड़ता है। दर्द, थकान, और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं इस दौरान कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। झुंझुनूं में कार्यरत महिला कर्मचारियों का कहना है कि ऐसी स्थिति में सवैतनिक अवकाश या वर्क फ्रॉम होम की सुविधा उन्हें न केवल शारीरिक राहत प्रदान करेगी, बल्कि उनकी कार्य उत्पादकता को भी बढ़ाएगी।

इस मांग के पीछे महिलाओं का तर्क है कि मासिक धर्म के दौरान कार्यस्थल पर उपस्थित रहना कई बार असहज और चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों के लिए, जहां मूलभूत सुविधाओं जैसे स्वच्छ शौचालयों और आरामदायक कार्यस्थल की कमी हो सकती है, यह मांग और भी प्रासंगिक हो जाती है।

ज्ञापन और प्रशासन की प्रतिक्रिया

महिला अधिकारियों और कर्मचारियों ने जिला कलक्टर अरुण गर्ग को सौंपे गए ज्ञापन में अपनी मांगों को स्पष्ट रूप से रखा। उन्होंने कहा कि यह नीति न केवल उनके स्वास्थ्य को प्राथमिकता देगी, बल्कि कार्यस्थल पर लैंगिक समानता को भी बढ़ावा देगी। इस मांग को उठाने वाली महिलाओं में विभिन्न विभागों की कर्मचारी शामिल हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, और प्रशासनिक सेवाएं शामिल हैं।

जिला कलक्टर अरुण गर्ग ने ज्ञापन स्वीकार करते हुए कहा कि यह मांग संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। उन्होंने आश्वासन दिया कि इसे राज्य सरकार तक पहुंचाया जाएगा और इस पर विचार-विमर्श के लिए उचित कदम उठाए जाएंगे। हालांकि, अभी तक इस मांग पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

देश में अन्य उदाहरण

मासिक धर्म के दौरान सवैतनिक अवकाश की मांग कोई नई बात नहीं है। भारत में कई निजी कंपनियां और कुछ राज्य सरकारें इस दिशा में कदम उठा चुकी हैं। उदाहरण के लिए, बिहार सरकार ने हाल ही में सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35% आरक्षण की घोषणा की है, जो महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है। इसके अलावा, कुछ निजी कंपनियों जैसे जोमैटो ने मासिक धर्म अवकाश नीति लागू की है, जिसे कर्मचारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सराहा है।

झुंझुनूं की यह मांग इस तरह की नीतियों को सरकारी क्षेत्र में लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह नीति लागू होती है, तो यह अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकती है।

मासिक धर्म को लेकर भारत में अभी भी कई सामाजिक और सांस्कृतिक वर्जनाएं मौजूद हैं। इस तरह की मांगें न केवल इन वर्जनाओं को तोड़ने में मदद करती हैं, बल्कि यह भी दर्शाती हैं कि महिलाएं अपनी सेहत और अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं। यह मांग कार्यस्थल पर लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ाने और महिलाओं के लिए एक समावेशी वातावरण बनाने में भी सहायक हो सकती है।

चुनौतियां और भविष्य की दिशा

हालांकि यह मांग महिलाओं के हित में है, लेकिन इसके लागू होने में कई चुनौतियां भी हैं। कुछ आलोचकों का मानना है कि सवैतनिक अवकाश की नीति से कार्यस्थल पर कर्मचारियों की कमी हो सकती है, विशेष रूप से उन विभागों में जहां पहले से ही कर्मचारी कम हैं। इसके अलावा, वर्क फ्रॉम होम की सुविधा को लागू करने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता होगी।

फिर भी, यह मांग एक स्वागत योग्य कदम है, जो महिलाओं के स्वास्थ्य और कल्याण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यदि इस मांग को सही ढंग से लागू किया जाता है, तो यह न केवल झुंझुनूं बल्कि पूरे राजस्थान और देश में कार्यरत महिलाओं के लिए एक सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

झुंझुनूं में राजकीय सेवा में कार्यरत महिला कर्मचारियों की यह मांग एक प्रगतिशील और संवेदनशील पहल है। यह न केवल उनके स्वास्थ्य और कार्यक्षमता को बेहतर बनाने की दिशा में एक कदम है, बल्कि यह समाज में मासिक धर्म से जुड़े मिथकों और वर्जनाओं को तोड़ने में भी मदद कर सकता है। अब यह देखना बाकी है कि प्रशासन और राज्य सरकार इस मांग पर क्या कदम उठाती है। इस तरह की नीतियां यदि लागू होती हैं, तो यह भारत में कार्यस्थल पर लैंगिक समानता और महिला कल्याण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकती हैं।

Yashaswani Journalist at The Khatak .