राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला: ज्यादा ब्याज देने वाले पोस्टमास्टर से 1.48 लाख की वसूली सही, ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द
राजस्थान हाईकोर्ट ने पोस्टमास्टर से 1.48 लाख रुपये की वसूली को वैध ठहराया, MIS में अधिक ब्याज देने की गलती पर CAT का फैसला रद्द किया।
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने डाक विभाग के एक पोस्टमास्टर को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (CAT) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पोस्टमास्टर से 1,48,599 रुपये की वसूली को गलत ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मासिक आय योजना (MIS) के नियमों का उल्लंघन कर अधिकतम सीमा से ज्यादा राशि पर गलत तरीके से ब्याज देने की वजह से विभाग को हुआ नुकसान की भरपाई पोस्टमास्टर को खुद करनी होगी। यह फैसला विभागीय अनुशासन और सरकारी योजनाओं के सख्त पालन पर जोर देता है।
मामले की पृष्ठभूमि; यह मामला राजस्थान के एक पोस्ट ऑफिस से जुड़ा है, जहां पोस्टमास्टर ने मासिक आय योजना (Monthly Income Scheme - MIS) के तहत ग्राहकों को नियमों से अधिक राशि पर ब्याज दे दिया था। MIS पोस्ट ऑफिस की एक लोकप्रिय बचत योजना है, जिसमें निवेशक एक निश्चित राशि जमा करते हैं और हर महीने ब्याज के रूप में आय प्राप्त करते हैं। भारत सरकार के डाक विभाग द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार:MIS खाते में अधिकतम निवेश सीमा व्यक्तिगत रूप से 9 लाख रुपये और संयुक्त खाते में 15 लाख रुपये है।, इस सीमा से अधिक राशि पर ब्याज नहीं दिया जा सकता। , यदि गलती से अधिक ब्याज दे दिया जाता है, तो विभाग को वित्तीय नुकसान होता है, जिसकी वसूली जिम्मेदार कर्मचारी से की जाती है। , पोस्टमास्टर ने ग्राहकों के खातों में अधिकतम सीमा से ऊपर की राशि पर भी ब्याज जोड़ दिया, जिससे विभाग को कुल 1,48,599 रुपये का नुकसान हुआ। विभाग ने यह राशि पोस्टमास्टर की सैलरी और अन्य भत्तों से वसूल करने का आदेश जारी किया।
ट्रिब्यूनल का फैसला और पोस्टमास्टर की याचिका; पोस्टमास्टर ने इस वसूली के खिलाफ केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (CAT) में अपील की। CAT ने पोस्टमास्टर के पक्ष में फैसला सुनाया और वसूली को अवैध करार देते हुए विभाग के आदेश को रद्द कर दिया। ट्रिब्यूनल का तर्क था कि यह गलती जानबूझकर नहीं थी और पोस्टमास्टर पर पूरी जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।इसके बाद डाक विभाग ने CAT के फैसले को चुनौती देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ में याचिका दायर की। विभाग का कहना था कि नियमों का पालन न करना गंभीर लापरवाही है और सरकारी धन का नुकसान किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला; जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस विपिन गुप्ता की डिवीजन बेंच ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद 7 नवंबर 2025 को अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया:नियमों का सख्त पालन: MIS योजना के दिशा-निर्देश स्पष्ट हैं। अधिकतम सीमा से अधिक राशि पर ब्याज देना पूरी तरह अवैध है। पोस्टमास्टर होने के नाते, यह उनकी जिम्मेदारी थी कि वे नियमों की जानकारी रखें और उनका पालन करें।
विभागीय नुकसान की भरपाई अनिवार्य: कोर्ट ने कहा कि सरकारी योजनाओं में किसी भी तरह की गलती से होने वाला वित्तीय नुकसान विभाग को नहीं झेलना चाहिए। यह राशि जिम्मेदार कर्मचारी से वसूल करना न्यायसंगत है। बेंच ने उदाहरण देते हुए कहा, "विभागीय नुकसान की पूर्ति जरूरी है, अन्यथा अनुशासनहीनता बढ़ेगी।"
CAT के फैसले में त्रुटि: ट्रिब्यूनल ने पोस्टमास्टर की गलती को हल्का मानकर फैसला दिया, जो गलत है। हाईकोर्ट ने CAT के आदेश को रद्द करते हुए विभाग की वसूली को पूरी तरह वैध ठहराया। , कोर्ट ने पोस्टमास्टर को निर्देश दिया कि वे 1,48,599 रुपये की राशि विभाग को वापस करें। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो विभाग उनकी सैलरी, पेंशन या अन्य सुविधाओं से यह राशि काट सकता है।
फैसले के व्यापक प्रभावडाक विभाग के लिए राहत: यह फैसला पूरे देश में डाक विभाग के कर्मचारियों के लिए एक चेतावनी है। अब पोस्ट ऑफिस कर्मचारी बचत योजनाओं में किसी भी तरह की लापरवाही से बचेंगे, वरना व्यक्तिगत नुकसान उठाना पड़ेगा।
सरकारी योजनाओं पर असर: MIS, SCSS (Senior Citizen Savings Scheme) जैसी योजनाओं में नियमों का उल्लंघन अब महंगा पड़ेगा। ग्राहकों को भी फायदा होगा, क्योंकि गलत ब्याज देने से योजना की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
कानूनी मिसाल: यह केस अन्य सरकारी विभागों में भी लागू हो सकता है, जहां कर्मचारियों की गलती से वित्तीय नुकसान होता है। हाईकोर्ट का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने की संभावना है, लेकिन फिलहाल यह बाध्यकारी है।
पोस्टमास्टर की प्रतिक्रिया; पोस्टमास्टर ने फैसले पर निराशा जताई है और कहा है कि वे सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। उनका तर्क है कि गलती सिस्टम की खामी से हुई थी, न कि जानबूझकर। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।