क्या टीएमसी के 9 विधायक जाएंगे बीजेपी में? ममता की बैठक से गैरमौजूदगी ने बढ़ाई सियासी हलचल
ममता की बैठक से 9 विधायक गायब, बीजेपी में जाने की अटकलों ने जोर पकड़ लिया है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर बड़े सियासी संकट की ओर बढ़ती दिख रही है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पहले से ही दबाव में थी, लेकिन अब पार्टी के भीतर संभावित टूट की अटकलों ने हालात और गंभीर कर दिए हैं।
कालीघाट स्थित मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास पर बुलाई गई नवनिर्वाचित विधायकों की अहम समीक्षा बैठक में कुल 80 में से केवल 71 विधायक ही शामिल हुए, जबकि 9 विधायक अनुपस्थित रहे। इसी गैरमौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है और दल-बदल की चर्चाओं को हवा दे दी है।
टीएमसी नेतृत्व का कहना है कि अनुपस्थित विधायकों ने पहले से सूचना दी थी और वे अपने-अपने क्षेत्रों में चुनाव के बाद की स्थिति को संभाल रहे थे। कुछ नेताओं को उत्तर बंगाल में ही रुकने के निर्देश भी दिए गए थे। लेकिन विपक्ष इस सफाई को स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
अंदरूनी तनाव और “धोखे” के आरोप
ममता बनर्जी ने हाल ही में अपनी ही पार्टी के कुछ नेताओं पर “अंदरूनी धोखे” का आरोप लगाकर सियासी तापमान बढ़ा दिया था। इसके बाद 9 विधायकों की अनुपस्थिति को उसी संदर्भ में देखा जा रहा है। पार्टी के भीतर असंतोष और संभावित बगावत की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
अनुशासनात्मक समिति का गठन
स्थिति को संभालने के लिए टीएमसी ने डेरेक ओ ब्रायन, फरहाद हकीम, चंद्रिमा भट्टाचार्य और असिमा पात्रा की एक अनुशासनात्मक समिति गठित की है, जो पार्टी के भीतर उठ रहे असंतोष और शिकायतों की जांच करेगी।
बयानबाज़ी से और बढ़ा तनाव
पार्टी के कुछ नेताओं के अलग-अलग बयानों ने भी स्थिति को जटिल बना दिया है। कुछ नेताओं ने चुनाव परिणामों पर सवाल उठाए हैं, जबकि अन्य ने सार्वजनिक रूप से जनादेश को स्वीकार किया है। इससे पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं।
ममता बनर्जी का सख्त रुख
ममता बनर्जी ने चुनाव परिणामों को चुनौती देने की बात कहते हुए कहा है कि उनके पास “ठोस सबूत” हैं और जरूरत पड़ने पर वे अदालत से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक जाएंगे। उन्होंने विधायकों से विरोध स्वरूप काले कपड़े पहनने की भी अपील की है।
क्या होगा आगे?
फिलहाल न तो टीएमसी और न ही कथित 9 विधायकों की ओर से किसी तरह की आधिकारिक पुष्टि हुई है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह असंतोष बढ़ा, तो पश्चिम बंगाल की सियासत में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।