पंजाब की बाढ़: खेत डूबे, यादें तैर आईं, 1988 का दर्द फिर जागा
पंजाब में भारी बारिश और बाढ़ ने खेतों-घरों को डुबो दिया, 1988 की भयावह बाढ़ की यादें ताजा हो रही हैं, जिसमें सैकड़ों मौतें और भारी तबाही हुई थी। गुरदासपुर, पठानकोट जैसे जिले सबसे ज्यादा प्रभावित, लोग राहत की उम्मीद में हैं।

पंजाब एक बार फिर भारी बारिश और नदियों के उफान से जूझ रहा है। खेतों में पानी भर गया है, घर डूबे हुए हैं और लोग अपनी जान-माल की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह दृश्य चार दशक पुरानी उस भयावह बाढ़ की याद दिला रहा है, जब सैकड़ों लोग मारे गए थे, लाशें सीमा पार पाकिस्तान तक बहकर पहुंच गई थीं और फसलों का भारी नुकसान हुआ था। उस समय की त्रासदी में एक सेना जनरल की हत्या तक हो गई थी। आज की स्थिति अभी उतनी विकराल नहीं है, लेकिन तबाही और डर हर तरफ फैला हुआ है।
मौजूदा बाढ़ की तबाही: हजारों एकड़ खेत डूबे, गांवों में पानी-पानी
पिछले एक हफ्ते में सतलुज, ब्यास और रावी नदियों के किनारे बसे करीब 500 गांवों में बाढ़ ने कहर बरपाया है। हजारों एकड़ कृषि भूमि, खासकर पकने वाली धान की फसल, पानी में डूब गई है। सैकड़ों घरों में पानी घुस गया, जिससे लोग बेघर हो गए हैं। हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के ओवरफ्लो हो रहे जलाशयों से पानी छोड़ा गया, जिसने स्थिति को और बिगाड़ दिया।
गुरदासपुर जिले के डुगरी गांव के पूर्व सरपंच गुरनाम सिंह ने बताया, "दशकों बाद हम फिर ऐसी मुसीबत में फंसे हैं। मेरी नजर में यह पहले से ज्यादा खराब है।" उन्होंने भगवंत मान के नेतृत्व वाली आप सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया। गुरदासपुर के अलावा पठानकोट, होशियारपुर, कपूरथला, अमृतसर, तरनतारन, फाजिल्का, फिरोजपुर, लुधियाना और पटियाला जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
अभी तक भारतीय पंजाब में मौतों की संख्या एक अंक में है, जबकि पाकिस्तानी पंजाब में इसी बाढ़ से 200 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। जम्मू क्षेत्र में हाल की बारिश से 40 से अधिक मौतें हुईं, और हिमाचल प्रदेश में पूरे मानसून में सैकड़ों जानें गईं।
1988 की बाढ़: 'हजार साल में एक बार' वाली आपदा की यादें
लोगों के जेहन में 1988 की सितंबर बाढ़ आज भी ताजा है, जो पंजाब की सबसे भयानक त्रासदियों में से एक थी। उस समय भारतीय पंजाब में 600 से 1,500 लोगों की मौत हुई थी। पोंग और भाखड़ा बांधों के प्रबंधन पर लापरवाही के आरोप लगे थे, जो फटने की कगार पर पहुंच गए थे।
उस साल सितंबर में मौसम विभाग ने 120 मिमी बारिश की भविष्यवाणी की थी, लेकिन 22 से 26 सितंबर के बीच पांच गुना ज्यादा पानी बरसा। इससे अचानक आई बाढ़ ने रिकॉर्ड खरीफ फसल के 75 फीसदी हिस्से को बर्बाद कर दिया। पंजाब के 12,000 गांवों में से 9,000 प्रभावित हुए। ऊपर हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में भी तबाही मची, जबकि नीचे हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली तक पानी पहुंचा।
पंजाबी अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक, लाशें सीमा पार पाकिस्तान तक बहकर पहुंच गईं। एक रिपोर्ट में 1,300 शवों का जिक्र था, जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। पाकिस्तान में भी बाढ़ ने भारी नुकसान किया था।
उग्रवाद के दौर में बाढ़ बनी साजिश का शक
1980 से मध्य-90 के दशक तक पंजाब उग्रवाद की चपेट में था। उग्रवादी समूहों ने बाढ़ को केंद्र सरकार की साजिश बताया, क्योंकि बांधों के फाटक खोलने से पंजाब को नुकसान हुआ। भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड (बीबीएमबी) के प्रमुख मेजर जनरल बीएन कुमार थे, जो एक सेना अधिकारी थे। उन्होंने बाढ़ को 'हजार साल में एक बार' वाली घटना बताया और जांच के लिए तैयार थे। लेकिन नवंबर 1988 में चंडीगढ़ में उनकी हत्या कर दी गई। वह पंजाब के 'काले दिनों' में मारे गए सबसे ऊंचे रैंक के अधिकारियों में से एक थे।
2023 में इस हत्या के आरोपी खालिस्तान कमांडो फोर्स के प्रमुख परमजीत सिंह पंवार की पाकिस्तान के लाहौर में गोली मारकर हत्या हो गई, जिससे यह मामला फिर सुर्खियों में आया।