ताइवान को 14 बिलियन डॉलर के हथियार नहीं देगा अमेरिका! ईरान युद्ध के बीच बड़ा फैसला
अमेरिका ने ताइवान को प्रस्तावित 14 बिलियन डॉलर के हथियारों की बिक्री पर फिलहाल रोक लगा दी है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि ईरान युद्ध के कारण अमेरिकी सेना को हथियारों की ज्यादा जरूरत है।
चीन और ताइवान के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव के बीच अमेरिका ने बड़ा फैसला लेते हुए ताइवान को प्रस्तावित 14 बिलियन डॉलर के हथियारों की बिक्री पर रोक लगा दी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अमेरिका लगातार ताइवान के समर्थन में खड़ा रहा है और चीन के विरोध के बावजूद उसे सैन्य सहायता देने की नीति अपनाता रहा है।
अमेरिकी प्रशासन के इस कदम को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इसके पीछे ईरान युद्ध, अमेरिकी सैन्य भंडार पर बढ़ता दबाव और चीन के साथ बदलते कूटनीतिक समीकरण प्रमुख वजह हो सकते हैं।
ईरान युद्ध के कारण बदली प्राथमिकताएं
अमेरिकी नेवी के कार्यवाहक सचिव हंग काओ ने इस फैसले की पुष्टि करते हुए कहा कि फिलहाल अमेरिका अपनी सैन्य जरूरतों को प्राथमिकता दे रहा है। उनके अनुसार ईरान युद्ध के चलते अमेरिकी सेना को बड़ी मात्रा में हथियारों और रक्षा उपकरणों की आवश्यकता पड़ रही है।
इसी कारण प्रशासन ने ताइवान को होने वाली हथियार सप्लाई पर अस्थायी रोक लगाने का फैसला लिया है, ताकि अमेरिकी सेना के पास पर्याप्त हथियार भंडार बना रहे।
क्या अमेरिका के हथियार भंडार पर पड़ा असर?
हालांकि हंग काओ ने कहा कि अमेरिका के पास पर्याप्त मात्रा में हथियार मौजूद हैं, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि लगातार युद्ध और सैन्य गतिविधियों के कारण अमेरिकी हथियार भंडार पर दबाव बढ़ रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान युद्ध के चलते अमेरिका को अपने रक्षा संसाधनों का तेजी से इस्तेमाल करना पड़ रहा है। ऐसे में विदेशी हथियार आपूर्ति पर अस्थायी रोक लगाना रणनीतिक कदम माना जा रहा है।
काओ ने यह भी स्पष्ट किया कि जब प्रशासन को उचित लगेगा, तब विदेशी सैन्य बिक्री की प्रक्रिया दोबारा शुरू की जा सकती है।
ट्रंप-शी जिनपिंग मुलाकात के बाद बदले संकेत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के कई विशेषज्ञ इस फैसले को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाल ही में हुई मुलाकात से भी जोड़कर देख रहे हैं।
बताया जा रहा है कि चीन-ताइवान मुद्दे पर दोनों नेताओं के बीच विस्तार से बातचीत हुई थी। इस दौरान शी जिनपिंग ने ट्रंप को स्पष्ट संदेश दिया था कि ताइवान मुद्दे में अमेरिकी दखल दोनों देशों के संबंधों पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह फैसला चीन के साथ तनाव कम करने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
क्या है चीन-ताइवान विवाद?
चीन और ताइवान के बीच विवाद 1949 से चला आ रहा है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान खुद को एक स्वतंत्र देश के रूप में देखता है। कई पश्चिमी देश और अंतरराष्ट्रीय शक्तियां भी ताइवान के साथ अलग पहचान के आधार पर संबंध बनाए हुए हैं।
चीन कई बार साफ कर चुका है कि वह ताइवान का चीन में विलय चाहता है और जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग से भी पीछे नहीं हटेगा। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बना हुआ है।
ताइवान पर हमले की आशंका?
मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि चीन गुप्त रूप से ताइवान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहा है। हालांकि चीन की ओर से अब तक इस तरह की किसी योजना की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
इसके बावजूद एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियां और चीन की आक्रामक रणनीति अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा रही हैं।
वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका द्वारा ताइवान को हथियार बिक्री पर रोक लगाने का असर सिर्फ एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति पर भी पड़ सकता है। इससे चीन-अमेरिका संबंधों में नरमी आने की संभावना जताई जा रही है, वहीं ताइवान की सुरक्षा को लेकर नई बहस भी शुरू हो सकती है।