तांत्रिक के भरोसे चोरी की जांच करने पर हाईकोर्ट सख्त: 15 दिन में जांच अधिकारी हटाने के आदेश
नागौर जिले में गहनों की चोरी के मामले की जांच में तांत्रिक की मदद लेने के आरोप पर राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक जांच अंधविश्वास के आधार पर नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने नागौर एसपी को 15 दिन के भीतर जांच अधिकारी बदलकर मामले की जांच किसी दूसरे अधिकारी को सौंपने के निर्देश दिए हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने नागौर जिले में गहनों की चोरी के एक मामले की जांच में कथित तौर पर तांत्रिक की मदद लेने पर पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने साफ कहा कि किसी भी आपराधिक मामले की जांच अंधविश्वास या तांत्रिक के इशारों पर नहीं की जा सकती। कोर्ट ने नागौर एसपी को आदेश दिया है कि 15 दिन के भीतर मौजूदा जांच अधिकारी को हटाकर मामले की जांच किसी दूसरे थाने के सब-इंस्पेक्टर या उससे वरिष्ठ अधिकारी को सौंपी जाए।
मामले की सुनवाई जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की सिंगल बेंच में हुई। यह आदेश नागौर जिले के श्रीबालाजी थाना क्षेत्र निवासी 80 वर्षीय खेमी देवी की ओर से दायर याचिका पर दिया गया।
घर से चोरी हुए थे सोने-चांदी के गहने
याचिकाकर्ता खेमी देवी पत्नी भेराराम ने 8 मार्च 2026 को श्रीबालाजी थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। शिकायत में बताया गया था कि 7 मार्च की रात उनके घर से उनके और उनकी बहू के सोने-चांदी के गहने चोरी हो गए।
एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की। खेमी देवी ने जांच अधिकारी हेड कॉन्स्टेबल रतिराम को कुछ संदिग्ध लोगों के नाम भी बताए थे, लेकिन पुलिस न तो चोरी का खुलासा कर पाई और न ही गहनों की बरामदगी कर सकी।
जांच में तांत्रिक की मदद लेने का आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता मनोहर सिंह राठौड़ ने अदालत को बताया कि जांच अधिकारी ने वैज्ञानिक और कानूनी तरीके अपनाने के बजाय अंधविश्वास का सहारा लिया। आरोप लगाया गया कि जांच अधिकारी कुछ ग्रामीणों और याचिकाकर्ता की बहू के पिता को लेकर अलवर जिले में एक तांत्रिक के पास पहुंचा।
वकील के अनुसार, तांत्रिक ने कथित तौर पर इशारा किया कि चोरी में बहू का पिता शामिल है। इसके बाद पुलिस ने बिना ठोस सबूत के उसी दिशा में जांच आगे बढ़ानी शुरू कर दी और बहू के पिता को संदिग्ध मानकर कार्रवाई करने लगी।
सरकार ने कोर्ट में पेश की स्टेटस रिपोर्ट
मामले में राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक विक्रम सिंह राजपुरोहित ने नागौर एसपी से प्राप्त स्टेटस रिपोर्ट अदालत में पेश की। रिपोर्ट में कहा गया कि जांच अधिकारी ने कई संदिग्धों से पूछताछ की और विभिन्न स्थानों पर जाकर जांच की।
हालांकि सरकार की ओर से यह स्वीकार किया गया कि जांच अधिकारी अलवर जिले में उस स्थान पर गया था, जहां तांत्रिक रहता है। लेकिन यह दावा किया गया कि अधिकारी ग्रामीणों को अपने साथ वहां नहीं ले गया था।
हाईकोर्ट ने जताई जांच प्रभावित होने की आशंका
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से यह संभावना स्पष्ट होती है कि जांच अधिकारी तांत्रिक के संपर्क में गया था। अदालत ने कहा कि किसी भी आपराधिक जांच को तांत्रिक की राय या अंधविश्वास से प्रभावित नहीं होने दिया जा सकता।
जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर जांच तांत्रिक के प्रभाव में की गई है तो इससे पूरी जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। अदालत ने माना कि असली आरोपियों तक पहुंचने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी है।
15 दिन में जांच बदलने के आदेश
हाईकोर्ट ने नागौर पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिए कि आदेश की प्रति मिलने के 15 दिनों के भीतर यह जांच श्रीबालाजी थाने से हटाकर किसी अन्य थाने के सब-इंस्पेक्टर या उससे वरिष्ठ अधिकारी को सौंपी जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नई जांच पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से की जानी चाहिए।