जम्मू-कश्मीर में शहीद दिवस पर नजरबंदी: उमर अब्दुल्ला ने अनिर्वाचित प्रशासन पर साधा निशाना

उमर अब्दुल्ला और अन्य नेताओं को 13 जुलाई 2025 को जम्मू-कश्मीर में शहीद दिवस मनाने से रोकने के लिए नजरबंद किया गया, जिससे अनिर्वाचित प्रशासन पर अलोकतांत्रिक कार्रवाई के आरोप लगे। इस प्रतिबंध ने जलियांवाला बाग की तुलना और 13 जुलाई को सार्वजनिक अवकाश बहाल करने की मांग के साथ राजनीतिक विवाद को जन्म दिया।

Jul 14, 2025 - 14:55
जम्मू-कश्मीर में शहीद दिवस पर नजरबंदी: उमर अब्दुल्ला ने अनिर्वाचित प्रशासन पर साधा निशाना

जम्मू-कश्मीर में 13 जुलाई को शहीद दिवस के अवसर पर प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और नजरबंदी के कारण राजनीतिक तनाव चरम पर पहुंच गया है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें और अन्य नेताओं को श्रीनगर के मज़ार-ए-शुहादा में 1931 के शहीदों को श्रद्धांजलि देने और फातिहा पढ़ने से रोका गया। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन और कश्मीर के इतिहास व शहीदों के बलिदान का अपमान बताया।

शहीद दिवस और इसका ऐतिहासिक महत्व

13 जुलाई 1931 को श्रीनगर सेंट्रल जेल के बाहर डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे कश्मीरियों पर उनकी सेना ने गोलीबारी की थी, जिसमें 22 लोग मारे गए थे। यह घटना कश्मीर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, जिसने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया और डोगरा शासक व ब्रिटिश प्रशासन को मुस्लिम समुदाय की शिकायतों पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया। इस घटना ने जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत को भी चिह्नित किया, जिसके परिणामस्वरूप पहली बार विधानसभा चुनाव हुए, हालांकि महाराजा के पास प्रमुख मामलों पर व्यापक अधिकार थे।

हर साल 13 जुलाई को कश्मीरी इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं, जिसमें मज़ार-ए-शुहादा में शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती थी। पहले इस दिन पुलिसकर्मी बंदूकों की सलामी देते थे और राजनेता जनसभाओं के माध्यम से शहीदों को याद करते थे। हालांकि, 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा (अनुच्छेद 370) समाप्त होने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के बाद से, प्रशासन ने शहीदों के कब्रिस्तान में किसी भी समारोह पर रोक लगा दी है। 2020 से 13 जुलाई और 5 दिसंबर (शेख अब्दुल्ला की जयंती) को आधिकारिक अवकाश की सूची से हटा दिया गया है। इसके बजाय, अब डोगरा शासक हरि सिंह की जयंती पर सार्वजनिक अवकाश मनाया जाता है।

उमर अब्दुल्ला की नजरबंदी और प्रतिक्रिया

13 जुलाई 2025 को शहीद दिवस के अवसर पर, उमर अब्दुल्ला सहित नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के कई नेताओं, मंत्रियों और विधायकों को नजरबंद कर दिया गया। श्रीनगर में मज़ार-ए-शुहादा की ओर जाने वाली सड़कों को सील कर दिया गया और कई नेताओं को उनके घरों में बंद कर दिया गया। उमर अब्दुल्ला ने इसे "अनिर्वाचित लोगों का अत्याचार" बताते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, "दिवंगत अरुण जेटली के शब्दों में कहें तो - जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र अनिर्वाचित लोगों का अत्याचार है। आज नई दिल्ली के अनिर्वाचित प्रतिनिधियों ने जम्मू-कश्मीर की जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को बंद कर दिया है।"

14 जुलाई को, उमर अब्दुल्ला ने बिना पूर्व सूचना के मज़ार-ए-शुहादा पहुंचने की कोशिश की। सुरक्षा बलों द्वारा रोके जाने पर उन्होंने कब्रिस्तान की दीवार फांदकर फातिहा पढ़ी। उन्होंने पुलिस पर शारीरिक प्रताड़ना का भी आरोप लगाया और एक्स पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें पुलिसकर्मी उन्हें रोकने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। उन्होंने लिखा, "मैं कुछ भी गैरकानूनी नहीं कर रहा था। ये 'कानून के रक्षक' हमें फातिहा पढ़ने से रोकने के लिए किस कानून का सहारा ले रहे थे, यह उन्हें बताना चाहिए।"

उमर अब्दुल्ला ने 13 जुलाई 1931 की घटना की तुलना जलियांवाला बाग नरसंहार से की और कहा, "13 जुलाई का नरसंहार हमारा जलियांवाला बाग है। जिन लोगों ने अपनी जान कुर्बान की, उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ ऐसा किया। यह शर्मनाक है कि इन सच्चे नायकों को आज सिर्फ इसलिए खलनायक के रूप में पेश किया जा रहा है क्योंकि वे मुसलमान थे।"

अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की नेता और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी नजरबंदी और प्रतिबंधों की निंदा की। उन्होंने एक्स पर लिखा, "जिस दिन आप हमारे नायकों को अपना मानेंगे, जैसे कश्मीरियों ने महात्मा गांधी से लेकर भगत सिंह तक, आपके नायकों को अपनाया है, उस दिन 'दिलों की दूरी' सचमुच खत्म हो जाएगी।" उन्होंने कहा कि कश्मीरियों और केंद्र सरकार के बीच अविश्वास तभी खत्म होगा जब शहीदों को सम्मान दिया जाएगा।

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक, जो शुक्रवार से नजरबंद हैं, ने कहा कि कश्मीर के शहीदों का बलिदान सामूहिक स्मृति में अंकित है और इसे प्रतिबंधों से मिटाया नहीं जा सकता। नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता तनवीर सादिक ने भी प्रशासन पर निर्वाचित प्रतिनिधियों को नजरबंद करने का आरोप लगाया और इसे शहीदों की विरासत का अपमान बताया।

प्रशासन और मीडिया पर उमर अब्दुल्ला का हमला

उमर अब्दुल्ला ने स्थानीय मीडिया पर भी निशाना साधा, जिसमें उन्होंने कुछ अखबारों को "कायर" करार दिया। उन्होंने कहा कि कई समाचार पत्रों ने निर्वाचित सरकार की नजरबंदी की खबर को दबा दिया, जिससे यह धारणा मजबूत होती है कि जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार का कोई अधिकार नहीं है।

राजनीतिक विवाद और छुट्टी की मांग

13 जुलाई को सरकारी छुट्टी घोषित न किए जाने को लेकर भी विवाद गहरा गया है। महबूबा मुफ्ती ने उमर अब्दुल्ला को पत्र लिखकर इस दिन को फिर से सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग की थी। उमर अब्दुल्ला की सरकार ने 13 जुलाई और 5 दिसंबर को छुट्टी बहाल करने का प्रस्ताव उपराज्यपाल के सामने रखा है, लेकिन इस पर अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है।

हालांकि, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया है। बीजेपी ने 13 जुलाई की तुलना जलियांवाला बाग से करने को "ऐतिहासिक रूप से गलत" और स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों का अपमान बताया।

Yashaswani Journalist at The Khatak .