बिहार चुनाव: एग्जिट पोल कुछ देर में, पिछले दो चुनावों में साबित हुए गलत – महिला वोटर्स, साइलेंट वोटर्स समेत 4 प्रमुख वजहें

बिहार में दूसरे चरण की वोटिंग शाम 6:30 बजे समाप्त, एग्जिट पोल जारी होंगे लेकिन पिछले 2015 और 2020 चुनावों में गलत साबित हुए, महिला और साइलेंट वोटर्स सहित 4 वजहों से पोल फेल, एनडीए को ओपिनियन पोल में बढ़त, परिणाम 14 नवंबर को,

Mohit Parihar
Mohit Parihar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026 Sub Editor
November 11, 2025 • 6:14 PM  10
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बिहार चुनाव: एग्जिट पोल कुछ देर में, पिछले दो चुनावों में साबित हुए गलत – महिला वोटर्स, साइलेंट वोटर्स समेत 4 प्रमुख वजहें
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बिहार चुनाव: एग्जिट पोल कुछ देर में, पिछले दो चुनावों में साबित हुए गलत – महिला वोटर्स, साइलेंट वोटर्स समेत 4 प्रमुख वजहें

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का दूसरा और अंतिम चरण आज जोर-शोर से चल रहा है। राज्य की 122 विधानसभा सीटों पर सुबह 7 बजे से शुरू हुई वोटिंग शाम 6:30 बजे समाप्त हो जाएगी। दोपहर 3 बजे तक 60 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया है, जो लोकतंत्र के महापर्व में जनता की उत्साहपूर्ण भागीदारी को दर्शाता है। वोटिंग समाप्ति के तुरंत बाद विभिन्न सर्वे एजेंसियों द्वारा एग्जिट पोल जारी किए जाएंगे, जो चुनाव परिणामों की दिशा-निर्देश प्रदान करने का दावा करेंगे। ये एग्जिट पोल हमेशा सटीक नहीं होते। पिछले दो विधानसभा चुनावों (2015 और 2020) में एग्जिट पोल बड़े पैमाने पर गलत साबित हुए थे, जिससे राजनीतिक दलों और जनता के बीच इनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं।इस बार के चुनाव में कुल 243 विधानसभा सीटें दांव पर हैं, जो दो चरणों में संपन्न हो रही हैं। पहले चरण में 121 सीटों पर 65 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि दूसरे चरण में भी इसी तरह का उत्साह देखने को मिल रहा है। चुनाव आयोग के अनुसार, पहले चरण की वोटिंग शांतिपूर्ण रही, लेकिन कुछ स्थानों पर तकनीकी खराबी और EVM संबंधी शिकायतें दर्ज की गईं। परिणाम 14 नवंबर को घोषित होंगे, जो न केवल बिहार की राजनीतिक तस्वीर बदल सकते हैं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी गठबंधनों की दिशा निर्धारित करेंगे।

पहले चरण की झलक: उच्च मतदान, लेकिन चुनौतियां बरकरार बिहार चुनाव का पहला चरण 5 नवंबर को संपन्न हुआ था, जिसमें 121 सीटों पर 65 प्रतिशत से अधिक वोट पड़े। यह आंकड़ा पिछले चुनावों की तुलना में थोड़ा बेहतर है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से सराहनीय रही। पहले चरण में एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) और महागठबंधन (आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस) के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला। विशेषज्ञों के अनुसार, जातिगत समीकरणों के साथ-साथ विकास, बेरोजगारी और प्रवासन जैसे मुद्दों ने वोटर्स का मन मोड़ा।दूसरे चरण में, जो आज चल रहा है, पटना, नालंदा, वैशाली और मुजफ्फरपुर जैसे महत्वपूर्ण जिलों की सीटें शामिल हैं। यहां भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है, और लगभग 5 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का उपयोग कर रहे हैं। दोपहर 3 बजे तक 60 प्रतिशत मतदान होने से अनुमान लगाया जा रहा है कि कुल मतदान 62-65 प्रतिशत के बीच रहेगा।

ओपिनियन पोल्स का दावा: एनडीए को बढ़त, लेकिन इतिहास सबक सिखाता है चुनाव से पहले किए गए तीन प्रमुख ओपिनियन पोल्स में एनडीए की सरकार बनने की संभावना जताई गई है। एक सर्वे के अनुसार, एनडीए को 130-140 सीटें मिल सकती हैं, जबकि महागठबंधन को 90-100 सीटों का अनुमान है। इन पोल्स में भाजपा-जेडीयू गठबंधन को महिलाओं और युवाओं का समर्थन मिलता दिख रहा है। हालांकि, ये ओपिनियन पोल एग्जिट पोल्स से अलग हैं, क्योंकि ये वोटिंग से पहले किए जाते हैं और जनता की राय पर आधारित होते हैं।लेकिन इतिहास गवाह है कि बिहार जैसे जटिल सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में सर्वे एजेंसियां अक्सर वोटर्स के मूड को सही से नहीं पकड़ पातीं। आइए, नजर डालते हैं पिछले तीन विधानसभा चुनावों के एग्जिट पोल्स के रुझानों पर:

2010 का चुनाव: अपेक्षाकृत सटीक, लेकिन सीमित दायरा 2010 के विधानसभा चुनाव में एग्जिट पोल्स ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए को मजबूत बहुमत का अनुमान लगाया था, जो काफी हद तक सही साबित हुआ। एनडीए ने 206 सीटें जीतीं, लेकिन यह दौर सर्वे एजेंसियों के लिए अपेक्षाकृत आसान था, क्योंकि जातिगत ध्रुवीकरण कम था।

2015 का चुनाव: सबसे बड़ी चूक – एनडीए को बढ़त, महागठबंधन की जीत 2015 में एग्जिट पोल्स ने एनडीए (भाजपा-बीजेपी) को स्पष्ट बहुमत का दावा किया। कई एजेंसियों ने एनडीए को 150 से अधिक सीटें दीं, जबकि महागठबंधन (आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस) को हार का अनुमान लगाया। लेकिन नतीजे उलट गए – महागठबंधन ने 178 सीटें जीतकर सरकार बनाई। यह एग्जिट पोल्स की सबसे बड़ी विफलता मानी जाती है। वजह? सर्वे में ग्रामीण और पिछड़े वोटर्स की अनदेखी।

2020 का चुनाव: उल्टी तस्वीर – महागठबंधन को बढ़त, एनडीए की वापसी 2020 में स्थिति विपरीत रही। अधिकांश एग्जिट पोल्स ने महागठबंधन को 140-150 सीटें देकर जीत का पूर्वानुमान लगाया। चिराग पासवान के बागी तेवरों के कारण जेडीयू को नुकसान की आशंका जताई गई। लेकिन परिणाम में एनडीए ने 125 सीटें जीतकर फिर सरकार बनाई। महागठबंधन 110 सीटों पर सिमट गया। यहां भी पोल्स गलत साबित हुए, जो बिहार की राजनीति की अप्रत्याशितता को रेखांकित करता है।

एग्जिट पोल गलत क्यों साबित होते हैं? चार प्रमुख वजहें बिहार जैसे राज्य में एग्जिट पोल्स की असफलता के पीछे कई संरचनात्मक और सामाजिक कारण हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, निम्नलिखित चार प्रमुख वजहें हैं जो सर्वे एजेंसियों को भ्रमित करती हैं:महिला वोटर्स का अप्रत्याशित व्यवहार: बिहार में महिलाओं की मतदान भागीदारी 2015 से बढ़ी है, जो अब 60 प्रतिशत से अधिक है। लेकिन सर्वे में महिलाओं के विचारों को सही से कैप्चर नहीं किया जाता। वे अक्सर विकास और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर वोट देती हैं, जो पोल्स में नजरअंदाज हो जाते हैं। 2015 में महिला वोट ने महागठबंधन को फायदा पहुंचाया, जबकि 2020 में एनडीए को। 

साइलेंट वोटर्स: चुपके से फैसला लेने वाले मतदाता: ये वे वोटर्स हैं जो सर्वे में अपनी राय नहीं बताते। बिहार के ग्रामीण और गरीब तबके में साइलेंट वोटर्स की संख्या अधिक है। वे जाति, धर्म या अंतिम समय के प्रचार से प्रभावित होते हैं, जो एग्जिट पोल के तुरंत बाद के आंकड़ों में नहीं झलकते। 2020 में ऐसे वोटर्स ने एनडीए को मजबूती दी।

जातिगत समीकरणों की जटिलता: बिहार की राजनीति जाति पर आधारित है – यादव, कुशवाहा, कोइरी, ईबीसी आदि। सर्वे एजेंसियां इन सूक्ष्म बदलावों को पकड़ने में असफल रहती हैं। उदाहरणस्वरूप, 2015 में महादलित और मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण पोल्स से छूट गया।

ग्रामीण vs शहरी विभाजन और सैंपलिंग त्रुटियां: अधिकांश पोल्स शहरी क्षेत्रों पर केंद्रित होते हैं, जबकि बिहार की 90 प्रतिशत आबादी ग्रामीण है। सैंपल साइज छोटा होने और सवालों की भाषा के कारण ग्रामीण वोटर्स का मूड गलत समझा जाता है। इसके अलावा, कोविड जैसे बाहरी कारकों ने 2020 में सैंपलिंग को प्रभावित किया।

ये वजहें न केवल एग्जिट पोल्स को अविश्वसनीय बनाती हैं, बल्कि राजनीतिक दलों को भी सतर्क रहने की सीख देती हैं। इस बार भी एग्जिट पोल आने पर जनता को इन्हें मनोरंजन के रूप में ही लेना चाहिए, न कि अंतिम सत्य के रूप में।

 बिहार चुनाव न केवल सत्ता की जंग है, बल्कि सामाजिक न्याय, विकास और समावेशिता का प्रतिबिंब भी। उच्च मतदान प्रतिशत से साफ है कि जनता सक्रिय है। एग्जिट पोल भले ही बहस छेड़ दें, लेकिन असली फैसला 14 नवंबर को आएगा। तब तक, बिहार की सियासी गलियों में सस्पेंस कायम रहेगा। क्या एनडीए अपनी लय बरकरार रखेगा, या महागठबंधन उलटफेर करेगा? समय बताएगा।

 

Mohit Parihar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026 Sub Editor

Mohit Parihar is a journalist at The Khatak, covering politics and public issues with a strong focus on ground reporting and factual storytelling.

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