बाड़मेर: कुत्तों के हमले में घायल हुए दो हिरण, ग्रामीणों ने बचाया; वन विभाग 10 घंटे बाद पहुंचा
बाड़मेर के गालाबेरी कुंभावास गांव में कुत्तों के हमले से घायल हुए दो हिरणों को ग्रामीणों ने बचाकर पूरी रात देखभाल की।
बाड़मेर जिले के रीको थाना क्षेत्र स्थित गालाबेरी कुंभावास गांव में इंसानियत और वन्यजीव संरक्षण की एक मिसाल देखने को मिली। शनिवार रात करीब 10 बजे कुत्तों के हमले में गंभीर रूप से घायल हुए दो हिरणों को ग्रामीणों ने बचाकर उनकी जान बचाने का प्रयास किया। ग्रामीण उन्हें अपने घर ले गए, प्राथमिक उपचार किया और पूरी रात उनकी निगरानी करते रहे।
घटना ने एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण और वन विभाग की आपातकालीन व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि सूचना देने के बावजूद वन विभाग की टीम मौके पर नहीं पहुंची और घायल हिरणों को समय पर सहायता नहीं मिल सकी।
कुत्तों के बीच फंसे हिरण, ग्रामीणों ने दिखाई तत्परता
गांव निवासी पपुराम जाणी के अनुसार उनके साथी सवाईराम रात में बाइक से जा रहे थे। इसी दौरान उन्होंने देखा कि कई आवारा कुत्तों ने दो हिरणों को घेर रखा था और उन पर हमला कर रहे थे। स्थिति इतनी गंभीर थी कि कुत्ते हिरणों को नोच रहे थे।
यह दृश्य देखकर ग्रामीणों ने तत्काल हस्तक्षेप किया और कुत्तों को भगाकर दोनों हिरणों को सुरक्षित बाहर निकाला। इसके बाद विजय खोथ को वाहन के साथ मौके पर बुलाया गया और घायल हिरणों को गाड़ी में डालकर गांव लाया गया।
ग्रामीणों ने किया प्राथमिक उपचार, पूरी रात रखी निगरानी
ग्रामीणों ने बताया कि घटना के तुरंत बाद वन विभाग को सूचना दी गई थी, लेकिन विभाग ने वाहन उपलब्ध नहीं होने की बात कहते हुए सुबह आने को कहा। ऐसे में ग्रामीणों ने स्वयं जिम्मेदारी उठाई।
दोनों हिरणों को सुरक्षित स्थान पर रखा गया, घावों का प्राथमिक उपचार किया गया और पूरी रात उनकी देखभाल की गई। ग्रामीणों का कहना है कि यदि वे समय पर मदद नहीं करते तो संभवतः दोनों हिरण रात नहीं बच पाते।
10 घंटे बाद पहुंचा टेम्पो, रेस्क्यू व्यवस्था पर उठे सवाल
रविवार सुबह करीब 8 बजे वन विभाग की टीम की जगह एक निजी थ्री-व्हीलर टेम्पो और उसका ड्राइवर मौके पर पहुंचा। इसे देखकर ग्रामीणों ने नाराजगी जताई और सवाल उठाया कि गंभीर रूप से घायल वन्यजीवों को ऐसे वाहन में ले जाना कितना सुरक्षित है।
ग्रामीणों ने आशंका जताई कि यदि रास्ते में झटके लगे तो हिरणों की हालत और बिगड़ सकती है। इस दौरान ड्राइवर ने खुद को वन विभाग का कर्मचारी नहीं बताते हुए कहा कि वह केवल किराए पर वाहन लेकर आया है।
‘देशी जुगाड़’ से किया गया रेस्क्यू
ग्रामीणों की आपत्ति के बावजूद हिरणों को उसी टेम्पो में अस्पताल भेजा गया। उन्हें सुरक्षित रखने के लिए सीटों को उलटकर नीचे जगह बनाई गई। एक तरफ गेट और दूसरी तरफ सब्जी रखने वाले कैरेट को रस्सियों से बांधकर अस्थायी घेरा तैयार किया गया।
इस जुगाड़ व्यवस्था के सहारे दोनों घायल हिरणों को सिंधरी स्थित पशु चिकित्सालय पहुंचाया गया, जहां उनका इलाज शुरू किया गया।
वन विभाग ने संसाधनों की कमी बताई
वन संरक्षक तेजाराम ने बताया कि शनिवार रात सूचना मिलने के बाद भी विभागीय वाहन उपलब्ध नहीं होने के कारण टीम मौके पर नहीं पहुंच सकी। उन्होंने कहा कि सुबह दोनों हिरणों का रेस्क्यू कर लिया गया और फिलहाल उनका इलाज सिंधरी अस्पताल में जारी है।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि विभाग के पास सीमित वाहन हैं, जिसके कारण हर सूचना पर तुरंत पहुंच पाना संभव नहीं हो पाता।
वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
यह घटना केवल दो हिरणों के घायल होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वन्यजीव संरक्षण तंत्र की तैयारियों और संसाधनों की स्थिति को भी उजागर करती है। यदि ग्रामीण समय रहते आगे नहीं आते तो दोनों हिरणों की जान जा सकती थी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वन विभाग को आपातकालीन रेस्क्यू के लिए पर्याप्त वाहन, स्टाफ और संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए, ताकि भविष्य में किसी वन्यजीव को सहायता के लिए घंटों इंतजार न करना पड़े।