राजस्थान पुलिस में बड़ा बदलाव: अब थानों में अलग होगी जांच और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी, 20 थानों में पायलट प्रोजेक्ट
राजस्थान हाईकोर्ट की सख्ती के बाद राज्य पुलिस में बड़े सुधार की तैयारी शुरू हो गई है। पुलिस ने कोर्ट में प्लान पेश करते हुए बताया कि अब थानों में जांच (Investigation), कानून-व्यवस्था (Law & Order) और प्रशासन (Administration) की अलग-अलग विंग बनाई जाएंगी।
राजस्थान में बढ़ती अपराध जांच पेंडेंसी और मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने पर हाईकोर्ट की नाराजगी के बाद पुलिस व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी शुरू हो गई है। राजस्थान पुलिस ने हाईकोर्ट में एक विस्तृत योजना पेश की है, जिसके तहत अब पुलिस थानों में जांच (इन्वेस्टिगेशन), कानून-व्यवस्था (लॉ एंड ऑर्डर) और प्रशासनिक कार्यों के लिए अलग-अलग इकाइयां बनाई जाएंगी।
इस नई व्यवस्था का उद्देश्य पुलिस अधिकारियों पर बढ़ते कार्यभार को कम करना, जांच की गुणवत्ता में सुधार लाना और लंबित मामलों के निस्तारण में तेजी लाना है।
हाईकोर्ट की सख्ती के बाद तैयार हुआ प्लान
राजस्थान हाईकोर्ट ने लंबे समय से लंबित मामलों और जांच में हो रही देरी को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार और पुलिस विभाग से जवाब मांगा था।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि वर्तमान व्यवस्था में एक ही पुलिस अधिकारी को अपराध की जांच, कानून-व्यवस्था बनाए रखने, वीआईपी ड्यूटी, चुनाव ड्यूटी, भीड़ नियंत्रण और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां एक साथ निभानी पड़ती हैं। इसका सीधा असर जांच की गुणवत्ता और मामलों के समयबद्ध निस्तारण पर पड़ता है।
हाईकोर्ट ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए पुलिस में जांच और कानून-व्यवस्था की अलग-अलग विंग बनाने का निर्देश दिया था।
चार राज्यों के मॉडल का किया अध्ययन
अदालत के निर्देशों की पालना करते हुए राजस्थान पुलिस ने केरल, पंजाब, दिल्ली और बिहार जैसे राज्यों की पुलिस व्यवस्था का अध्ययन किया।
इन राज्यों में लागू मॉडलों का विश्लेषण करने के बाद राजस्थान पुलिस ने एक नई कार्ययोजना तैयार की है, जिसे हाईकोर्ट में प्रस्तुत किया गया।
योजना के अनुसार जांच अधिकारियों को नियमित कानून-व्यवस्था ड्यूटी, वीआईपी सुरक्षा, चुनाव ड्यूटी और अन्य प्रशासनिक कार्यों से मुक्त रखा जाएगा ताकि वे पूरी तरह अपराध जांच पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
20 पुलिस थानों में शुरू होगा पायलट प्रोजेक्ट
राजस्थान पुलिस ने प्रस्ताव दिया है कि शुरुआत में राज्य के 20 चयनित पुलिस थानों में इस व्यवस्था को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जाएगा।
इन थानों में तीन अलग-अलग इकाइयां बनाई जाएंगी—
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जांच (Investigation Wing)
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कानून-व्यवस्था (Law & Order Wing)
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प्रशासनिक इकाई (Administrative Wing)
यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में इसे पूरे राज्य में लागू किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने पुलिस के इस प्रस्ताव को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को निर्धारित की है।
एक जांच अधिकारी के पास 70 तक केस
अदालत में प्रस्तुत रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, कई शहरी पुलिस थानों में एक जांच अधिकारी के पास एक समय में 40 से 70 तक सक्रिय मामले होते हैं। इतनी बड़ी संख्या में मामलों की जांच करने के कारण अधिकारियों के लिए प्रत्येक केस पर पर्याप्त समय देना संभव नहीं हो पाता।
इसका परिणाम यह होता है कि जांच की गुणवत्ता प्रभावित होती है और मामलों की पेंडेंसी लगातार बढ़ती जाती है।
महिलाओं और संपत्ति अपराधों में कम दोषसिद्धि दर
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि महिलाओं के खिलाफ अपराध और संपत्ति संबंधी अपराधों में दोषसिद्धि (Conviction Rate) केवल 40 से 50 प्रतिशत के बीच है।
इसके अलावा साइबर अपराध, आर्थिक अपराध और एनडीपीएस (NDPS) से जुड़े कई मामलों की जांच दो-दो साल से अधिक समय तक लंबित रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जांच अधिकारियों पर अत्यधिक कार्यभार और विशेषज्ञ संसाधनों की कमी इसकी प्रमुख वजह है।
935 नए पद सृजित करने की सिफारिश
नई व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए अतिरिक्त मानव संसाधन की आवश्यकता भी सामने आई है।
समिति ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत चयनित 20 पुलिस थानों में करीब 935 नए पद सृजित करने की सिफारिश की है।
इसके साथ ही साइबर अपराध, वित्तीय अपराध और फोरेंसिक जांच के विशेषज्ञों को अनुबंध के आधार पर नियुक्त करने का सुझाव भी दिया गया है, ताकि जटिल मामलों की जांच अधिक पेशेवर और वैज्ञानिक तरीके से की जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के 20 साल पुराने आदेश का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ऐतिहासिक "प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ" फैसले का भी उल्लेख किया।
इस फैसले में पुलिस सुधारों के तहत जांच और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारियों को अलग करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया था।
अदालत ने टिप्पणी की कि लगभग दो दशक बीत जाने के बावजूद राजस्थान में इन सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया है।
आधुनिक जांच लैब की कमी पर भी चिंता
हाईकोर्ट ने राज्य में आधुनिक फोरेंसिक और जांच प्रयोगशालाओं की कमी पर भी चिंता जताई।
अदालत ने कहा कि कई मामलों में वैज्ञानिक जांच के लिए अन्य राज्यों की प्रयोगशालाओं पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे जांच प्रक्रिया में अनावश्यक देरी होती है और अपराधियों को इसका फायदा मिल सकता है।
कोर्ट ने राज्य सरकार को अत्याधुनिक जांच प्रयोगशालाएं स्थापित करने और तकनीकी संसाधनों को मजबूत करने पर भी जोर दिया है।
पुलिस व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारियां अलग-अलग कर दी जाती हैं तो पुलिसकर्मी अधिक दक्षता के साथ काम कर सकेंगे। इससे न केवल लंबित मामलों में कमी आएगी बल्कि अपराध जांच की गुणवत्ता और दोषसिद्धि दर में भी सुधार होने की संभावना है।
राजस्थान पुलिस का यह प्रस्ताव राज्य की कानून व्यवस्था और आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक आधुनिक, जवाबदेह और प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।