87 दिन जेल में बेगुनाह नेत्रहीन की आंसुओं भरी कहानी: पुलिस की साजिश उजागर, भाई ने हाईकोर्ट से दिलाई रिहाई
राजस्थान के चूरू में दृष्टिहीन अमिचंद को झूठे मारपीट केस में 87 दिन जेल में रहना पड़ा, लेकिन उनके भाई संदीप की कोशिशों और हाईकोर्ट के आदेश से उन्हें रिहा कर दिया गया। पुलिस की लापरवाही और सांठगांठ के कारण यह अन्याय हुआ।

राजस्थान के चूरू जिले के सिद्धमुख तहसील के भीमसाना गांव में रहने वाले 28 वर्षीय अमिचंद को एक झूठे मारपीट के मामले में 87 दिन तक जेल में रहना पड़ा। जन्म से ही काला मोतिया (ग्लूकोमा) बीमारी के कारण धुंधला दिखाई देने वाले अमिचंद को पुलिस ने बिना ठोस सबूत के गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। उनकी रिहाई के लिए उनके दृष्टिहीन भाई संदीप की कोशिशों और हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद आखिरकार न्याय मिला।
इस साल होली के त्योहार के दौरान 14 मार्च को जोथड़ा गांव में पांच लोगों ने एक व्यक्ति के साथ मारपीट की थी। इस मामले में चूरू के तारानगर थाने में तीन लोगों के खिलाफ नामजद और दो अन्य के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। परिवार के आरोप के अनुसार, इस मामले में एक आरोपी पवन ने पुलिस से सांठगांठ कर अपने स्थान पर अमिचंद को आरोपी बना दिया। पुलिस ने 26 मार्च को अमिचंद को गिरफ्तार कर राजगढ़ जेल भेज दिया।
पवन ने अमिचंद के परिवार को गुमराह करते हुए कहा कि उसे काम के लिए जम्मू भेजा गया है। लगभग एक महीने तक परिवार को अमिचंद के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। इस दौरान अमिचंद जेल में अपनी बेगुनाही की गुहार लगाता रहा, लेकिन उसकी बात न तो पुलिस ने सुनी और न ही मजिस्ट्रेट ने।
परिवार की बीमारी और आर्थिक तंगी
अमिचंद का परिवार पहले से ही आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है। परिवार के सात सदस्य, जिनमें अमिचंद, उनकी 10 वर्षीय बेटी, भाई, चाची, चाची के बच्चे, मां और नानी शामिल हैं, काला मोतिया बीमारी से पीड़ित हैं। इस बीमारी के कारण उन्हें धुंधला दिखाई देता है, जिससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी और भी मुश्किल है।
कैसे हुआ मामले का खुलासा?
जब एक महीने तक अमिचंद का कोई अता-पता नहीं चला, तो परिवार ने हरियाणा में रहने वाले उनके भाई संदीप को सूचित किया। संदीप ने गांव आकर सिद्धमुख थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज की। तब पुलिस ने बताया कि अमिचंद राजगढ़ जेल में बंद है। यह सुनकर परिवार स्तब्ध रह गया। संदीप ने जेल में अमिचंद से मुलाकात की और पूरे मामले का खुलासा हुआ।
संदीप ने वकील हरदीप सिंह सुंदरिया की मदद से 5 जून को चूरू एसपी को शिकायत दी और मामले की दोबारा जांच की मांग की। चूरू एसपी ने राजगढ़ के सहायक पुलिस अधीक्षक निश्चय प्रसाद एम को जांच सौंपी। जांच में पाया गया कि मारपीट के वीडियो में अमिचंद कहीं नजर नहीं आया था। इसके बावजूद तत्कालीन जांच अधिकारी ने अमिचंद से लाठी बरामद करने और झूठी निशानदेही करवाने जैसे कदम उठाए थे।
कोर्ट का रुख और हाईकोर्ट का फैसला
पुलिस ने जांच रिपोर्ट तारानगर कोर्ट में पेश की, लेकिन कोर्ट ने कहा कि मामला विचाराधीन होने के कारण पुलिस बिना अनुमति के दोबारा जांच नहीं कर सकती। इसके बाद, संदीप ने हाईकोर्ट जोधपुर में याचिका दायर की। हाईकोर्ट के जस्टिस मनोज कुमार गर्ग ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि अमिचंद को झूठा फंसाया गया था।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए 11 जुलाई को अमिचंद की रिहाई के आदेश दिए। साथ ही, तारानगर थाने के एसएचओ और तत्कालीन जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद सोमवार को अमिचंद को जेल से रिहा कर दिया गया।
अमिचंद की आपबीती
रिहाई के बाद अमिचंद ने बताया, "पवन मुझे अपने घर बुलाने आया था। उसने मुझे नशीला पदार्थ पिलाया और पुलिस के सामने पेश कर दिया। मैंने पुलिस को बार-बार बताया कि मैं बेगुनाह हूं, लेकिन किसी ने मेरी नहीं सुनी। मुझे मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर जेल भेज दिया गया।" जेल में 87 दिन गुजारने वाले अमिचंद ने कहा कि वह रोज रोता था और अपनी बेगुनाही की गुहार लगाता था।
पुलिस और प्रशासन पर सवाल
इस मामले ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। बिना ठोस सबूत के एक दृष्टिहीन व्यक्ति को जेल भेजना और उसके परिवार को महीनों तक अंधेरे में रखना पुलिस की लापरवाही को दर्शाता है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब यह उम्मीद है कि दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।