राज्यसभा चुनाव: आखिर BJP ने सतीश पूनिया और अलका गुर्जर को ही क्यों चुना? जानें पीछे का पूरा गणित

राजस्थान की तीन राज्यसभा सीटों के लिए बीजेपी और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। बीजेपी ने सामाजिक और जातीय संतुलन साधते हुए सतीश पूनिया और अलका गुर्जर को मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस ने नीरज डांगी पर फिर भरोसा जताया है।

Jun 5, 2026 - 13:22
राज्यसभा चुनाव: आखिर BJP ने सतीश पूनिया और अलका गुर्जर को ही क्यों चुना? जानें पीछे का पूरा गणित
सीएम आवास पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से मिलते अलका गुर्जर और सतीश पूनिया

राज्यसभा चुनाव को लेकर राजस्थान की सियासत में हलचल तेज हो गई है। तीन राज्यसभा सीटों के लिए बीजेपी और कांग्रेस ने अपने-अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है, जिसके बाद राजनीतिक समीकरणों पर चर्चा और तेज हो गई है।

बीजेपी ने इस बार संगठन और सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया और राष्ट्रीय सचिव अलका गुर्जर को उम्मीदवार बनाया है। वहीं कांग्रेस ने मौजूदा सांसद नीरज डांगी को एक बार फिर मैदान में उतारकर अनुभव और दलित प्रतिनिधित्व पर भरोसा जताया है।

बीजेपी का रणनीतिक दांव

बीजेपी ने राज्यसभा चुनाव में दो अनुभवी और संगठन से जुड़े नेताओं को मौका देकर स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति पर काम कर रही है।

सतीश पूनिया जाट समुदाय से आते हैं और लंबे समय तक प्रदेश अध्यक्ष रहकर संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा चुके हैं। वर्तमान में वे हरियाणा बीजेपी के प्रभारी हैं। विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद पार्टी ने उन पर भरोसा बनाए रखा है।

वहीं अलका गुर्जर गुर्जर समाज से आती हैं और पार्टी की राष्ट्रीय सचिव हैं। वे दिल्ली बीजेपी की सह-प्रभारी भी हैं। उनके राजनीतिक और पारिवारिक अनुभव को देखते हुए उन्हें महिला नेतृत्व और ओबीसी प्रतिनिधित्व के तौर पर अहम माना जा रहा है।

बीजेपी ने इस कदम से जाट, गुर्जर और ओबीसी वोट बैंक को साधने की कोशिश की है, खासकर पूर्वी राजस्थान और प्रदेश के बड़े हिस्से में प्रभाव बढ़ाने की रणनीति दिखाई दे रही है।

कांग्रेस का भरोसा अनुभव पर

कांग्रेस ने पाली जिले से आने वाले नीरज डांगी को एक बार फिर राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया है। डांगी मेघवाल (अनुसूचित जाति) समुदाय से आते हैं और लंबे समय से पार्टी संगठन में सक्रिय रहे हैं।

वे 2004 से 2009 तक युवा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष भी रह चुके हैं। हालांकि वे तीन बार विधानसभा चुनाव हार चुके हैं, लेकिन 2020 में उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया गया था।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का भरोसा भी उनकी दावेदारी को मजबूत करता है। कांग्रेस इस कदम के जरिए दलित प्रतिनिधित्व और संसदीय अनुभव को प्राथमिकता देना चाहती है।

राजनीतिक समीकरण और संभावनाएं

राजस्थान विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए बीजेपी की दो और कांग्रेस की एक सीट पर जीत लगभग तय मानी जा रही है। इसी वजह से दोनों दलों ने अपने मजबूत और रणनीतिक उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।

बीजेपी ने कुछ अन्य राज्यों में भी उम्मीदवार घोषित किए हैं, जबकि कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर कई नामों पर भरोसा जताया है। यह चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं बल्कि संगठनात्मक और सामाजिक संदेश देने का भी माध्यम बन गया है।

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