33 साल पुराने फायरिंग केस में 84 वर्षीय बुजुर्ग को सजा, कांपते हाथ-पाँव से जेल पहुंचे बुजुर्ग ...

बिहार के छपरा में 1992 के एक फायरिंग मामले में 33 साल बाद अदालत ने 84 वर्षीय आरोपी दीप राय को दोषी करार देते हुए जेल भेज दिया। मामले के अन्य चार आरोपी समय के साथ दुनिया छोड़ चुके हैं, जबकि इकलौते जीवित बचे आरोपी को अब सजा मिली है।

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Web Desk Verified Media or Organization • 11 Jun, 2026 Sub Editor
June 2, 2026 • 1:10 PM  19
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33 साल पुराने फायरिंग केस में 84 वर्षीय बुजुर्ग को सजा, कांपते हाथ-पाँव से जेल पहुंचे बुजुर्ग ...

जिस गुनाह की कहानी 33 साल पहले लिखी गई थी, उसकी आखिरी किश्त अब अदालत के कमरे में पूरी हुई। बिहार के छपरा जिले से सामने आया यह मामला न सिर्फ एक आपराधिक मुकदमे का अंत है, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था में होने वाली देरी पर भी कई सवाल खड़े करता है। करीब 33 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने 84 वर्षीय बुजुर्ग आरोपी दीप राय को दोषी करार देते हुए जेल भेजने का आदेश दिया है।


33 साल पहले का गुनाह
मामला 10 मई 1992 का है। उस समय बिहार के जुड़ावनपुर थाना क्षेत्र में आपसी विवाद के चलते एक दंपति पर जानलेवा हमला और फायरिंग की घटना हुई थी। पीड़ित पक्ष की शिकायत पर पुलिस ने दीप राय समेत कुल पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। घटना के बाद जांच शुरू हुई और मामला अदालत तक पहुंचा, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी चली कि एक पूरी पीढ़ी गुजर गई।

4 आरोपियों को मौत 
समय के साथ इस मामले के चार आरोपियों की मौत हो गई। लेकिन दीप राय के खिलाफ मुकदमा जारी रहा। अदालत में वर्षों तक सुनवाई, गवाहों के बयान और कानूनी बहस का दौर चलता रहा। आखिरकार अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर दीप राय को दोषी मानते हुए जेल भेजने का फैसला सुनाया।

न्याय व्यवस्था की देरी पर बहस 
फैसले के बाद अदालत परिसर से जो तस्वीर सामने आई, उसने लोगों को भावुक कर दिया। 84 वर्षीय दीप राय उम्र और बीमारी के कारण इतने कमजोर हो चुके हैं कि वह अपने पैरों पर ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे। उन्हें दो लोगों के सहारे अदालत से बाहर लाया गया और जेल के लिए रवाना किया गया। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो भी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें उनकी शारीरिक स्थिति साफ दिखाई दे रही है।

इस मामले ने एक बार फिर देश की न्याय व्यवस्था में होने वाली देरी पर बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या किसी मामले के फैसले में तीन दशक से अधिक समय लगना न्याय व्यवस्था की सफलता है या फिर उसकी सबसे बड़ी कमजोरी। लोगों का कहना है कि यदि फैसला समय पर आता तो शायद पीड़ित और आरोपी दोनों को इतनी लंबी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।

कानून नहीं भूला, 33 साल बाद मिली सजा
हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्याय में देरी जरूर हुई, लेकिन अदालत ने अंततः अपना कर्तव्य निभाया है। यह फैसला इस बात का उदाहरण है कि कानून की नजर में अपराध की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। चाहे कितना भी समय बीत जाए, अपराध का हिसाब एक दिन जरूर होता है।


लोगों के मन में एक ही सवाल
जब दीप राय कांपते कदमों से दो लोगों का सहारा लेकर जेल की ओर बढ़ रहे थे, तब वहां मौजूद लोगों के मन में एक ही सवाल था— क्या इसे इंसाफ की जीत कहा जाए या फिर उस सिस्टम की सुस्ती, जिसने एक फैसले को मुकम्मल होने में पूरी जिंदगी लगा दी? जवाब चाहे जो भी हो, लेकिन इस फैसले ने यह जरूर साबित कर दिया कि कानून के हाथ लंबे होते हैं और अपराध कितना भी पुराना क्यों न हो, उसका हिसाब एक दिन चुकता करना ही पड़ता है।

फिलहाल अदालत के आदेश के बाद दीप राय को जेल भेज दिया गया है। 33 साल बाद आए इस फैसले की चर्चा पूरे इलाके में हो रही है और इसे न्यायिक इतिहास के दुर्लभ मामलों में से एक माना जा रहा है।

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