'वंदे मातरम् का सम्मान है, लेकिन...' थरूर बोले- परंपरा को लोगों पर बोझ न बनाएं
राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के सभी 6 छंदों को सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से गाने-बजाने के नए निर्देशों पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सवाल खड़े किए हैं।
राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर देश में नई बहस शुरू हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के तहत सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और विभिन्न औपचारिक आयोजनों में राष्ट्रगीत के सभी छह छंद गाने या बजाने की व्यवस्था किए जाने के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस पर सवाल उठाए हैं।
केरल के तिरुवनंतपुरम में मीडिया से बातचीत के दौरान थरूर ने कहा कि वंदे मातरम् देश का राष्ट्रगीत है और इसका सम्मान हर भारतीय करता है, लेकिन हर कार्यक्रम में इसके पूरे संस्करण को अनिवार्य बनाना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने कहा कि अधिकांश लोगों को केवल शुरुआती एक-दो छंद ही याद हैं और परंपरागत रूप से भी इन्हीं का सार्वजनिक आयोजनों में उपयोग होता रहा है।
थरूर बोले- पूरा राष्ट्रगीत गाने से लोगों को होगी असुविधा
शशि थरूर ने बताया कि फरवरी 2026 में दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने देखा कि कार्यक्रम की शुरुआत और समापन दोनों समय वंदे मातरम् का पूरा संस्करण बजाया गया। गीत की लंबाई अधिक होने के कारण लोगों को दो बार लंबे समय तक खड़े रहना पड़ा।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत के प्रति किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन हर कार्यक्रम में पूरे छह छंदों का अनिवार्य गायन लोगों के लिए बोझिल साबित हो सकता है।
थरूर ने स्पष्ट कहा कि वह स्वयं वंदे मातरम् का सम्मान करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर इसे खुशी-खुशी गा सकते हैं, लेकिन इसे हर आयोजन में अनिवार्य रूप से लागू करना उचित नहीं माना जा सकता।
BJP पर राजनीतिक एजेंडे का आरोप
मंगलवार को अपने बयान को आगे बढ़ाते हुए थरूर ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही वंदे मातरम् के शुरुआती छंदों को गाने की परंपरा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मुद्दे को लेकर भाजपा राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है।
थरूर ने चुनौती देते हुए कहा कि जो नेता पूरे राष्ट्रगीत को अनिवार्य बनाने की बात कर रहे हैं, वे पहले स्वयं इसके सभी छंद गाकर दिखाएं।
केंद्र सरकार के नए दिशा-निर्देश क्या हैं?
गृह मंत्रालय द्वारा जारी नए प्रोटोकॉल के अनुसार अब सरकारी कार्यक्रमों और कई औपचारिक आयोजनों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को विशेष स्थान दिया जाएगा।
नए नियमों की प्रमुख बातें
- राष्ट्रगान से पहले राष्ट्रगीत गाया या बजाया जाएगा।
- वंदे मातरम् के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे।
- पूरा राष्ट्रगीत लगभग 3 मिनट 10 सेकंड में पूरा होगा।
- राष्ट्रगीत के दौरान सभी लोगों का खड़े रहना आवश्यक होगा।
- स्कूलों में दिन की शुरुआत सामूहिक राष्ट्रगीत गायन से हो सकती है।
- आवश्यकता होने पर गीत की मुद्रित प्रतियां वितरित की जा सकेंगी।
किन अवसरों पर गाया जाएगा वंदे मातरम्?
नए दिशानिर्देशों के अनुसार राष्ट्रगीत का उपयोग इन अवसरों पर किया जा सकता है—
- राष्ट्रीय ध्वज फहराने के दौरान
- राष्ट्रपति के आगमन पर
- राष्ट्रपति के संबोधन से पहले और बाद में
- राज्यपाल और उपराज्यपाल के सरकारी समारोहों में
- नागरिक सम्मान समारोहों में
- सरकारी स्कूलों में प्रार्थना सभा के दौरान
- राष्ट्रीय और राजकीय आयोजनों में
हालांकि फिलहाल राष्ट्रगीत न गाने या नियमों का पालन न करने पर किसी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं किया गया है।
वंदे मातरम् का इतिहास
‘वंदे मातरम्’ की रचना प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी। बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया।
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार इसे सार्वजनिक मंच से गाया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत देशभक्ति और आजादी की लड़ाई का प्रमुख प्रतीक बन गया।
स्वतंत्र भारत में 1950 में संविधान सभा ने इसे राष्ट्रीय गीत (National Song) का दर्जा दिया।
राष्ट्रगीत बनाम राष्ट्रगान: क्या है अंतर?
भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत है। राष्ट्रगान को लेकर कानूनी दिशा-निर्देश और सम्मान से जुड़े स्पष्ट प्रावधान हैं, जबकि राष्ट्रगीत के मामले में परंपरा और सरकारी प्रोटोकॉल अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसी कारण राष्ट्रगीत के सभी छह छंदों को अनिवार्य बनाने के मुद्दे पर अब राजनीतिक, संवैधानिक और सांस्कृतिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है।