बेमौसम बारिश ने किसानों पर दोहरी मार खरीफ की तबाही के बाद रबी की उम्मीदें भी डूब गईं पानी में!
टोंक जिले में बेमौसम बारिश ने किसानों पर दोहरी मार की है। खरीफ फसलें (ज्वार, बाजरा, मूंग) पहले ही अतिवृष्टि से बर्बाद हो चुकी थीं, अब रबी की बुवाई के बीच सरसों-चने की फसलें जलमग्न होकर सड़ने लगी हैं। खेतों में पानी भर गया, नुकसान 50-70% तक अनुमानित। किसान आर्थिक संकट में, गिरदावरी और मुआवजे की मांग कर रहे हैं। प्रशासन ने सर्वे शुरू करने का आश्वासन दिया है।
टोंक, 29 अक्टूबर 2025: राजस्थान के टोंक जिले में किसानों का दुर्भाग्य थमने का नाम ही नहीं ले रहा। मानसून की विदाई के बाद भी बेमौसम बारिश ने एक बार फिर अन्नदाताओं की कमर तोड़ दी है। खरीफ सीजन में अतिवृष्टि से ज्वार, बाजरा, मूंग और उड़द जैसी फसलें लगभग चौपट हो चुकी थीं, और अब रबी की बुवाई के ठीक बीच में आई इस आफत ने सरसों और चने की फसलों को भी संकट में डाल दिया है। जिले के टोडारायसिंह उपखंड समेत कई ग्रामीण इलाकों में पिछले 48 घंटों से रुक-रुक कर हो रही रिमझिम और मूसलाधार बारिश ने खेतों को जलमग्न कर दिया है। किसानों की साल भर की मेहनत पर पानी फिर गया, और अब आर्थिक संकट की काली छाया मंडराने लगी है।
खरीफ की कड़वी यादें अभी ताजा, रबी पर भी बारिश का कहर
टोंक जिले में इस साल खरीफ सीजन बेहद विपरीत रहा। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में औसत से 200 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई, जिससे लगभग 80,000 हेक्टेयर में बोई गई फसलें—जैसे ज्वार (25,000 हेक्टेयर), मूंग (39,000 हेक्टेयर) और बाजरा (9,300 हेक्टेयर)—पूरी तरह बर्बाद हो गईं। खेतों में लगातार जलभराव से फसलें सड़ गईं, और किसानों को कर्ज चुकाने के लिए भी मजबूर होना पड़ा। कई किसानों ने बताया कि अतिवृष्टि ने न केवल फसलें नष्ट कीं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी घटा दी, जिससे रबी की तैयारी पहले से ही मुश्किल हो गई।लेकिन किस्मत ने फिर करवट ली। अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में, जब रबी की बुवाई जोरों पर थी, सुबह-सुबह बादल घिर आए और 15 घंटे से अधिक समय तक रिमझिम बारिश का सिलसिला चला। टोडारायसिंह क्षेत्र में तो हालात सबसे ज्यादा गंभीर हैं—खेतों में पानी भर गया, सरसों की बुवाई आधी-अधूरी रह गई, और जो फसलें बो चुकी थीं, वे जड़ से सड़ने लगीं। स्थानीय किसान रामस्वरूप गुर्जर ने बताया, "खेतों की मिट्टी अभी सूखी भी नहीं थी कि यह बारिश आ गई। सरसों का समय निकल गया, अब चने की फसल पर भी खतरा मंडरा रहा है। पिछले साल की कमाई खत्म, इस साल की उम्मीदें भी मिट्टी में मिल गईं।" जिले भर में सैकड़ों हेक्टेयर खेत प्रभावित हुए हैं, और विशेषज्ञों का अनुमान है कि नुकसान 50-70 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
जलमग्न खेतों में किसानों की जद्दोजहद, आर्थिक बोझ बढ़ा
बारिश का असर सिर्फ फसलों तक सीमित नहीं रहा। कई जगहों पर खेत पूरी तरह डूब गए, जिससे किसानों को रात-दिन पानी निकालने की मशक्कत करनी पड़ रही है। ग्रामीण इलाकों में बिजली-पानी की व्यवस्था चरमरा गई है, और सड़कें कीचड़ से लबालब हो गईं। एक अन्य किसान, सीताराम जाट, ने शिकायत की, "हमारी मेहनत का फल तो आसमान ही खा रहा है। खरीफ में नुकसान हुआ, अब रबी भी बच नहीं पाएगी। कर्ज के जाल में फंसकर कैसे जिएंगे?" आंकड़ों के लिहाज से, टोंक जैसे जिले में रबी फसलों का क्षेत्रफल 1.5 लाख हेक्टेयर से अधिक है, और इस बारिश से कम से कम 20-30 हजार हेक्टेयर प्रभावित होने का खतरा है। इससे न केवल उत्पादन घटेगा, बल्कि बाजार में सरसों और चने की कीमतों पर भी असर पड़ेगा।मौसम विभाग के अनुसार, यह बेमौसम बारिश पश्चिमी विक्षोभ और मानसून की लंबी विदाई का नतीजा है। अगले 2-3 दिनों में और बारिश की संभावना बनी हुई है, जो स्थिति को और जटिल बना सकती है। विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि किसान जल निकासी की तत्काल व्यवस्था करें, फसल को सुखाएं और फफूंद संक्रमण से बचाव के लिए दवाओं का छिड़काव करें। लेकिन ज्यादातर छोटे किसानों के पास संसाधनों की कमी है, जिससे नुकसान और बढ़ रहा है।
प्रशासन से गुहार: गिरदावरी और मुआवजे की मांग तेज
किसान अब प्रशासन के दरवाजे पर धरने दे रहे हैं। उन्होंने जिला कलेक्टर से तत्काल गिरदावरी (फसल नुकसान का सर्वे) कराने और मुआवजा वितरित करने की मांग की है। विपक्षी नेता गोविंद सिंह डोटासरा ने भी ट्वीट कर सरकार से विशेष राहत पैकेज की अपील की है, जबकि स्थानीय विधायक सुरेश दाधीच ने मौसम अपडेट शेयर कर किसानों की चिंता जताई। जिला प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि कृषि विभाग की टीमों को भेजा जा रहा है, और प्रभावित किसानों को फसल बीमा के तहत सहायता दी जाएगी। पिछले वर्षों के अनुभव से किसान जानते हैं कि मुआवजा समय पर मिलना चाहिए, वरना कर्ज का बोझ और बढ़ जाता है।टोंक के ये अन्नदाता न सिर्फ देश के अन्न भंडार भरते हैं, बल्कि अपनी जिंदगी की लड़ाई भी लड़ रहे हैं। सरकार और प्रशासन की त्वरित कार्रवाई से ही उनकी उम्मीदें जिंदा रह सकती हैं। फिलहाल, ग्रामीण इलाकों में उदासी का माहौल है—एक तरफ दिवाली की रौनक, दूसरी तरफ खेतों में डूबी फसलें। क्या इस बार किसानों को न्याय मिलेगा, या फिर आसमान की मार जारी रहेगी? जिले भर में निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं।