मनरेगा पर 'प्रहार' के खिलाफ मंच पर 'हुंकार': गीतों और नृत्य के जरिए मजदूरों ने नए कानून को बताया करोड़ों से विश्वासघात
जयपुर के शहीद स्मारक पर अरुणा रॉय, निखिल डे और कांग्रेस नेताओं के नेतृत्व में मजदूरों ने मनरेगा को खत्म करने के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने गीतों और नृत्य के जरिए अपना विरोध जताते हुए नए कानून VB-GRAM-G को रद्द करने की मांग की। वक्ताओं ने इसे करोड़ों ग्रामीणों के साथ "ऐतिहासिक विश्वासघात" बताया और कहा कि दिसंबर 2025 से लागू होने वाला यह नया बिल मजदूरों का कानूनी अधिकार छीनकर उन्हें केंद्र सरकार की मर्जी पर निर्भर कर देगा। उनकी मुख्य मांग मनरेगा को उसके मूल स्वरूप में बहाल रखने की है।
जयपुर: राजस्थान की राजधानी आज एक अलग ही किस्म के 'प्रतिरोध' की गवाह बनी। जयपुर का शहीद स्मारक केवल नारों से नहीं, बल्कि ढोलक की थाप और लोकगीतों की गूंज से भी सराबोर था। मौका था 'मजदूर महापंचायत' का, जहाँ राजस्थान के कोने-कोने से आए हजारों ग्रामीण मजदूरों ने केंद्र सरकार के नए VB-GRAM-G बिल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट आरोप है कि दिसंबर 2025 से लागू होने वाला नया VB-GRAM-G बिल मजदूरों के 'कानूनी हक' को छीनकर उसे केंद्र की 'मर्जी और बजट' के हवाले कर देगा, जिससे ग्राम सभाओं की शक्ति पूरी तरह खत्म हो जाएगी। इस विरोध की खास बात इसका कलात्मक स्वरूप रहा, जहाँ मजदूरों ने मंच पर नाचकर और लोकगीत गाकर यह संदेश दिया कि मनरेगा उनके लिए केवल रोजगार नहीं बल्कि जीने का सम्मान है। प्रदर्शन के दौरान मांग की गई कि केंद्र सरकार इस केंद्रीकृत और मजदूर-विरोधी कानून को तुरंत रद्द करे और मनरेगा को उसके पुराने स्वरूप में बहाल करे, वरना यह आंदोलन पूरे देश में ग्रामीण आक्रोश की नई लहर पैदा करेगा।
मनरेगा बनाम VB-GRAM-G: क्या है विवाद की जड़?
प्रदर्शनकारियों और सामाजिक संगठनों का सीधा आरोप है कि केंद्र सरकार दिसंबर 2025 से मनरेगा (MGNREGA) को समाप्त कर जो नया कानून लाने जा रही है, वह करोड़ों मजदूरों के साथ एक "ऐतिहासिक विश्वासघात" है। सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय और निखिल डे के अनुसार, मनरेगा ने मजदूरों को 'काम मांगने का कानूनी हक' दिया था, लेकिन नया बिल इस अधिकार को छीनकर रोजगार को केंद्र सरकार की मर्जी और बजट के आवंटन पर निर्भर बना देगा।
मजदूरों के बीच सबसे बड़ा डर यह है कि नया बिल ग्राम सभाओं की शक्तियों को पूरी तरह खत्म कर देगा और निर्णय लेने की पूरी शक्ति केंद्र के हाथों में सिमट जाएगी। यह न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए घातक है, बल्कि संवैधानिक विकेंद्रीकरण की आत्मा के भी खिलाफ है।
विरोध का कलात्मक और मानवीय स्वरूप
इस महापंचायत की सबसे खास बात इसका कलात्मक स्वरूप रहा। जहाँ आमतौर पर प्रदर्शनों में आक्रोश और तनाव होता है, वहीं यहाँ मजदूरों ने मंच पर नाचकर और लोकगीत गाकर अपना विरोध दर्ज कराया। इन गीतों के माध्यम से संदेश दिया गया कि मनरेगा उनके लिए केवल 100 दिन का रोजगार नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान और जीने का आधार है। मजदूरों ने मंच से साफ कहा कि "यह हक हमने लड़कर लिया है, और इसे छीनने की किसी भी कोशिश का जवाब सड़कों पर दिया जाएगा।"
प्रमुख हस्तियां और राजनीतिक समर्थन
इस विशाल धरने में सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी के कई दिग्गजों ने भी शिरकत की। जयपुर शहर कांग्रेस अध्यक्ष सुनील शर्मा, विधायक रफीक खान, प्रशांत शर्मा, मनीष यादव और पूर्व विधायक वेदप्रकाश सोलंकी सहित कई नेताओं ने मजदूरों की मांगों का समर्थन किया। वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस केंद्रीकृत और मजदूर-विरोधी कानून को तुरंत रद्द नहीं किया और मनरेगा को उसके मूल स्वरूप में बहाल नहीं रखा, तो राजस्थान से उठी यह आक्रोश की चिंगारी पूरे देश में एक बड़े आंदोलन का रूप ले लेगी।