19 साल की लड़की को चाहिए नया दिल… पर डोनर का इंतजार क्यों बन गया जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई?

राजस्थान में 19 साल की लड़की समेत 66 मरीज हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए डोनर का इंतजार कर रहे हैं। हर साल 300 मरीजों को जरूरत होने के बावजूद सिर्फ 9 ट्रांसप्लांट ही हो पाए हैं।

May 30, 2026 - 13:36
19 साल की लड़की को चाहिए नया दिल… पर डोनर का इंतजार क्यों बन गया जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई?

राजस्थान में दिल के मरीजों की हालत बेहद चिंताजनक बनी हुई है। प्रदेश में फिलहाल 66 मरीज ऐसे हैं जिन्हें हार्ट या हार्ट-लंग्स ट्रांसप्लांट की सख्त जरूरत है, लेकिन वे लगातार डोनर का इंतजार कर रहे हैं। इनमें एक 19 साल की युवती भी शामिल है, जिसकी जिंदगी अब सिर्फ एक डोनर पर टिकी हुई है।

डॉक्टर्स के मुताबिक हर साल करीब 250 से 300 मरीजों को हार्ट ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है, लेकिन इसके बावजूद राज्य में यह जीवनरक्षक प्रक्रिया बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही है।

सिर्फ 9 ट्रांसप्लांट, कई जिंदगियां अधर में

साल 2020 में एसएमएस अस्पताल में सरकारी स्तर पर हार्ट ट्रांसप्लांट की शुरुआत की गई थी। उम्मीद थी कि मरीजों को अब बाहर नहीं जाना पड़ेगा, लेकिन अब तक सिर्फ 9 हार्ट ट्रांसप्लांट ही सफल हो पाए हैं।

इनमें से कई मरीजों की बाद में मौत भी हो चुकी है, जबकि कुछ मरीज ही सामान्य जीवन जी पा रहे हैं।

19 साल की युवती समेत कई मरीज इंतजार में

चाकसू की रहने वाली 19 वर्षीय युवती को हार्ट ट्रांसप्लांट की जरूरत है। इसके अलावा 16 साल का एक लड़का और कई अन्य मरीज भी डोनर की तलाश में हैं। डॉक्टर्स का कहना है कि कई बार मरीज को समय पर डोनर मिल भी जाता है, लेकिन ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में देरी या मरीज की असहमति के कारण ऑपरेशन टल जाता है।

क्यों नहीं मिल पा रहे डोनर?

1. ऑर्गन डोनेशन को लेकर जागरूकता की कमी

ब्रेन डेड मरीजों के परिजन अंगदान के लिए तुरंत तैयार नहीं होते, जिससे कई जिंदगियां बचाई नहीं जा पातीं।

2. काउंसलिंग सिस्टम कमजोर

परिजनों को समझाने के लिए मजबूत मेडिकल काउंसलिंग की कमी एक बड़ी समस्या है।

3. डर और भ्रम

कई मरीज हार्ट ट्रांसप्लांट को जोखिम मानकर प्रक्रिया से पीछे हट जाते हैं।

4. सिस्टम में सीमित संसाधन

डेडिकेटेड यूनिट और विशेषज्ञ स्टाफ की कमी भी बड़ी बाधा है।

डॉक्टरों की राय

डॉक्टर्स के अनुसार राजस्थान में हर साल सैकड़ों मरीजों को ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है, लेकिन जागरूकता और रजिस्टर्ड मरीजों की कमी के कारण वास्तविक प्रक्रिया प्रभावित होती है। एसएमएस अस्पताल में अब तक 9 ट्रांसप्लांट हुए हैं, जबकि सर्वाइवल रेट लगभग 60% से अधिक बताया जा रहा है।

बड़ा सवाल

जब तकनीक, डॉक्टर और सुविधा मौजूद हैं… तो फिर क्यों 19 साल की लड़की और 66 मरीजों की जिंदगी सिर्फ डोनर के इंतजार में अटकी हुई है?

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