कांग्रेस के 5 जिलाध्यक्षों ने राहुल गांधी को लिखा पत्र, दिल्ली में क्यों जुटे राजस्थान के नेता?

राजस्थान राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर नीरज डांगी पर भरोसा जताया है, लेकिन इस फैसले से दक्षिण राजस्थान के नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ गई है।

Jun 5, 2026 - 13:04
कांग्रेस के 5 जिलाध्यक्षों ने राहुल गांधी को लिखा पत्र, दिल्ली में क्यों जुटे राजस्थान के नेता?

जयपुर। राजस्थान की एकमात्र राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस उम्मीदवार के चयन को लेकर पार्टी के भीतर लंबे समय तक मंथन और राजनीतिक खींचतान चलती रही। कई नामों पर चर्चा और क्षेत्रीय संतुलन की मांगों के बावजूद कांग्रेस आलाकमान ने मौजूदा सांसद नीरज डांगी पर ही दोबारा भरोसा जताया। हालांकि इस निर्णय ने दक्षिण राजस्थान, विशेषकर मेवाड़-वागड़ क्षेत्र के नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष को और बढ़ा दिया है।

राज्यसभा उम्मीदवार की घोषणा से पहले कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और पदाधिकारी दिल्ली में डेरा डाले हुए थे। उनका कहना था कि इस बार पार्टी को दक्षिण राजस्थान से किसी नेता को उच्च सदन में भेजकर क्षेत्रीय असंतोष दूर करना चाहिए। लेकिन अंतिम फैसला नीरज डांगी के पक्ष में गया, जिससे लंबे समय से चली आ रही मांग एक बार फिर अधूरी रह गई।

46 साल से राज्यसभा में प्रतिनिधित्व का इंतजार

उदयपुर संभाग के कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वर्ष 1980 में धूलेश्वर मीणा के बाद से दक्षिण राजस्थान को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। पिछले 46 वर्षों में कांग्रेस ने कई बार राज्यसभा सीटें जीतीं, लेकिन मेवाड़-वागड़ क्षेत्र के किसी नेता को मौका नहीं दिया गया।

इसी मुद्दे को लेकर उदयपुर, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा और सलूम्बर के जिला कांग्रेस अध्यक्षों ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को संयुक्त पत्र भेजा था। पत्र में कहा गया कि कांग्रेस का यह क्षेत्र लंबे समय से पार्टी का मजबूत गढ़ रहा है, फिर भी यहां के नेताओं और कार्यकर्ताओं की लगातार उपेक्षा की गई है।

आदिवासी और सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की उठी मांग

दक्षिण राजस्थान के नेताओं का तर्क था कि इस क्षेत्र में बड़ी आदिवासी आबादी और कांग्रेस का मजबूत संगठनात्मक आधार होने के बावजूद पार्टी ने राज्यसभा में संतुलित प्रतिनिधित्व नहीं दिया। नेताओं ने कहा कि भाजपा ने समय-समय पर आदिवासी और सामान्य वर्ग के नेताओं को राज्यसभा तथा विभिन्न बोर्ड-निगमों में अवसर देकर सामाजिक समीकरण साधे हैं, जबकि कांग्रेस इस मामले में पीछे रह गई है।

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि प्रदेश से चुने जाने वाले 10 राज्यसभा सदस्यों में कई बार कांग्रेस के आठ तक सदस्य रहे, लेकिन उदयपुर संभाग को कभी प्राथमिकता नहीं मिली।

बीएपी के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी चिंता

कांग्रेस नेताओं ने अपने पत्र में यह भी चेतावनी दी कि दक्षिण राजस्थान में भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के उभार के बाद कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक प्रभावित हुआ है। यदि पार्टी क्षेत्रीय नेतृत्व को पर्याप्त महत्व नहीं देगी तो आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।

नेताओं का मानना है कि सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन बनाए बिना कांग्रेस के लिए आदिवासी बहुल क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत रखना मुश्किल होगा।

सीपी जोशी और दिनेश खोड़निया भी थे दावेदार

राज्यसभा टिकट की दौड़ में पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी, एआईसीसी सदस्य दिनेश खोड़निया और राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा के नाम भी चर्चा में थे। पवन खेड़ा को बाद में कर्नाटक से राज्यसभा उम्मीदवार बनाया गया, जबकि दक्षिण राजस्थान के नेताओं ने सीपी जोशी और दिनेश खोड़निया के पक्ष में जोरदार पैरवी की।

विशेष रूप से दिनेश खोड़निया ने राज्यसभा में दक्षिण राजस्थान और सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व का मुद्दा लगातार उठाया था। इसके बावजूद कांग्रेस नेतृत्व ने अनुभव और राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए नीरज डांगी को ही पुनः उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया।

क्या संदेश देना चाहती है कांग्रेस?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस ने नीरज डांगी को दोबारा मौका देकर संगठनात्मक स्थिरता और अनुभव को प्राथमिकता दी है। हालांकि दक्षिण राजस्थान में बढ़ती नाराजगी पार्टी के लिए भविष्य में चुनौती बन सकती है। खासकर ऐसे समय में जब आदिवासी क्षेत्रों में नई राजनीतिक ताकतें उभर रही हैं और कांग्रेस अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाने की कोशिश कर रही है।

राज्यसभा टिकट को लेकर उठी यह बहस केवल एक सीट तक सीमित नहीं है, बल्कि कांग्रेस के भीतर क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, सामाजिक संतुलन और संगठनात्मक रणनीति से जुड़े बड़े सवाल भी खड़े कर रही है।

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