राजस्थान के रेगिस्तान में जंजीरों में कैद जिंदगी: मानसिक बीमारी ने छीनी इंसानों की आजादी
राजस्थान के बाड़मेर जिले के कई गांवों में मानसिक रूप से बीमार लोगों को इलाज के अभाव में पेड़ों और झोपड़ियों में जंजीरों से बांधकर रखा जा रहा है।
राजस्थान के बाड़मेर जिले के दूरदराज गांवों में मानसिक बीमारी सिर्फ एक मेडिकल समस्या नहीं, बल्कि दर्द, गरीबी, लाचारी और सामाजिक उपेक्षा की ऐसी कहानी बन चुकी है, जहां इंसानों को जानवरों की तरह जंजीरों में बांधकर रखा जा रहा है। कहीं पेड़ से बंधा युवक चीखता नजर आता है, तो कहीं झोपड़ी के बाहर जंजीरों में जकड़ी महिला अपनी जिंदगी काट रही है। कोई कमरे में बंद है, तो कोई सालों से खुले आसमान के नीचे कैद जिंदगी जीने को मजबूर है। यह तस्वीरें सिर्फ मानसिक बीमारी की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की भी हैं जो आज तक इन लोगों तक सही इलाज और मदद नहीं पहुंचा पाया।
पेड़ से बंधा पीरे खान, दो साल से जंजीरों में कैद
बाड़मेर की शिव तहसील से करीब 40 किलोमीटर दूर कानासर गांव। चारों तरफ तपता रेगिस्तान और 48 डिग्री की झुलसा देने वाली गर्मी। इसी गांव में 22 साल का पीरे खान एक पेड़ से जंजीरों में बंधा मिला। वह बार-बार चिल्लाता है — “भाग जाऊंगा… भाग जाऊंगा…” कुछ देर बाद उसकी भाभी चांदनी बाहर आती हैं, ताला खोलती हैं और उसे खेत में शौच के लिए ले जाती हैं। फिर वापस उसी पेड़ से बांध देती हैं। यह दृश्य किसी इंसान का कम और किसी जानवर को बांधने जैसा ज्यादा लगता है।
“क्या करूं… बेटा भाग जाता है”
पीरे की मां कम्मी खातून की आंखों में थकान और बेबसी साफ दिखाई देती है। वह बताती हैं कि पति की मौत के बाद पीरे भेड़ चराकर परिवार चलाने में मदद करता था। लेकिन 2022 में अचानक उसकी मानसिक हालत बिगड़ने लगी। वह चीखने लगा, खेतों में भागने लगा और लोगों पर पत्थर फेंकने लगा। गांव वालों ने इसे “भूत-प्रेत” का असर बताया। परिवार उसे मौलवी और तांत्रिकों के पास लेकर गया। ताबीज पहनाए गए, झाड़-फूंक करवाई गई, लेकिन हालत सुधरने की बजाय और बिगड़ती चली गई। कम्मी खातून कहती हैं “रस्सियों से बांधा, खाट से बांधा… लेकिन सब तोड़कर भाग जाता था। कई-कई दिन गायब रहता था। अब मजबूरी में जंजीर और ताला लगाना पड़ा।” आज पीरे की पूरी जिंदगी उसी पेड़ के आसपास सिमट चुकी है।
इलाज से ज्यादा मजबूत अंधविश्वास
पीरे के चचेरे भाई शफी बताते हैं कि परिवार उसे बाड़मेर और जोधपुर तक इलाज के लिए लेकर गया था, लेकिन पैसे की कमी और लंबी दूरी सबसे बड़ी परेशानी बन गई। परिवार दिहाड़ी मजदूरी से मुश्किल से 300 रुपए रोज कमा पाता है। ऐसे में बार-बार अस्पताल ले जाना संभव नहीं हो पाता। इसी वजह से गांवों में लोग मेडिकल इलाज की बजाय तांत्रिकों, मौलवियों और झाड़-फूंक पर ज्यादा भरोसा करने लगते हैं।
तीन साल से जंजीरों में बंधी मोड़ी देवी
खारी गांव में 45 साल की मोड़ी देवी पिछले तीन साल से झोपड़ी के बाहर जंजीरों में बंधी हैं। उनके पति दूद्धा राम, जो खुद विकलांग हैं, रोते हुए बताते हैं “लोगों को पत्थर मारती थीं… गांव वाले डर गए। मजबूरी में जंजीर खरीदकर लाना पड़ा।” उन्होंने पत्नी का इलाज कराने के लिए कर्ज लेकर जोधपुर तक का सफर किया, लेकिन दवाइयों का असर नहीं हुआ। धीरे-धीरे परिवार ने उम्मीद छोड़ दी।अब मोड़ी देवी दिन-रात उसी जंजीर में बंधी रहती हैं।
“भगवान इन्हें अपने पास बुला ले…”
केकड़ गांव की 65 वर्षीय तुग्गी देवी पिछले 15 साल से इसी तरह बंधी जिंदगी जी रही हैं। परिवार वालों का कहना है कि पहले वह सामान्य थीं, लेकिन बाद में अचानक हिंसक हो गईं। लोगों को मारने लगीं और गांव-गांव भटकने लगीं। उनके देवर मंगदा राम कहते हैं: “अब कभी-कभी लगता है भगवान इन्हें अपने पास बुला ले… इस हालत में देखकर बहुत दर्द होता है।”
कमरे में कैद परमेश्वरी
मिट्ठरा गांव की 20 वर्षीय परमेश्वरी को उसके परिवार ने पिछले ढाई महीने से कमरे में बंद कर रखा है। उसकी मां पारू देवी बताती हैं कि अचानक बेटी का व्यवहार बदल गया। वह गुस्से में लोगों का गला पकड़ने लगी और चीजें फेंकने लगी। अब उसे खिड़की से खाना-पानी दिया जाता है। परिवार को डर है कि अगर दरवाजा खोल दिया गया, तो वह किसी को नुकसान पहुंचा सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत
बाड़मेर के CMHO विष्णु राम विश्नोई का कहना है कि अब जिले में मानसिक रोगों के इलाज की सुविधा उपलब्ध है और आशा वर्कर्स गांव-गांव जाकर ऐसे मरीजों की पहचान करती हैं।
हालांकि जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आती है। जिन परिवारों से बातचीत हुई, उनमें से किसी ने भी यह नहीं बताया कि कभी कोई स्वास्थ्यकर्मी उनकी मदद के लिए पहुंचा हो। बड़े इलाके, दूर-दूर बसे घर, गरीबी और जागरूकता की कमी इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल: क्या इंसानों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं?
इन गांवों की तस्वीरें सिर्फ मानसिक बीमारी की नहीं, बल्कि उस सामाजिक और सरकारी विफलता की कहानी भी कहती हैं, जहां इलाज की जगह जंजीरें इस्तेमाल हो रही हैं। परिवारों का दर्द भी कम नहीं है। वे अपने ही लोगों को बांधते समय टूटते हैं, लेकिन उनके पास दूसरा रास्ता नहीं बचता।
इन कहानियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है क्या मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों का इलाज और सम्मानजनक जीवन आज भी इस देश के सबसे दूर बसे गांवों तक नहीं पहुंच पाया है?