बाड़मेर-जैसलमेर में 5 सालों में 26.44% बच्चों ने छोड़ी पढ़ाई: सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल ने लोकसभा में सरकार पर साधा निशाना, बोले- सिस्टम ही बच्चों को छोड़ने पर मजबूर कर रहा है
पिछले 5 सालों में बाड़मेर-जैसलमेर में 26.44% बच्चों ने पढ़ाई छोड़ी। सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल ने लोकसभा में सरकार पर हमला बोला - गरीबी-स्वास्थ्य बहाने हैं, असल वजह सिस्टम की कमियां: 70% शिक्षक पद खाली, 50% स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं नहीं। बच्चे नहीं छोड़ रहे, सिस्टम उन्हें मजबूर कर रहा है!
नई दिल्ली/बाड़मेर/जैसलमेर: राजस्थान के रेगिस्तानी और सीमावर्ती जिलों बाड़मेर और जैसलमेर में शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है। पिछले पांच वर्षों में प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक कुल 26.44 प्रतिशत बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी है। बाड़मेर सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल ने लोकसभा में तारांकित प्रश्न के दौरान शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा दिए गए आंकड़ों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार की शिक्षा नीतियों पर तीखा हमला बोला है।
सांसद बेनीवाल ने कहा कि ये आंकड़े केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) और समग्र शिक्षा अभियान की जमीनी विफलता को स्पष्ट रूप से उजागर कर रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि रेगिस्तानी इलाकों में बच्चों का स्कूल छोड़ना कोई व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्या नहीं है, बल्कि शिक्षा सिस्टम की गंभीर कमियों के कारण बच्चे मजबूरन पढ़ाई छोड़ रहे हैं।
जिलावार ड्रॉपआउट दर के आंकड़े
बाड़मेर जिले में कुल ड्रॉपआउट दर 21.34 प्रतिशत रही है। इसमें:प्राथमिक स्तर पर 2.76 प्रतिशत,उच्च प्राथमिक स्तर पर 6.42 प्रतिशत,माध्यमिक स्तर पर 12.16 प्रतिशत बच्चों ने स्कूल छोड़ा।जैसलमेर जिले में स्थिति और गंभीर है, जहां कुल ड्रॉपआउट दर 30.94 प्रतिशत दर्ज की गई। इसमें:प्राथमिक स्तर पर 6.14 प्रतिशत,उच्च प्राथमिक स्तर पर 9.46 प्रतिशत,माध्यमिक स्तर पर 15.34 प्रतिशत बच्चों ने शिक्षा छोड़ी।सांसद बेनीवाल ने बताया कि जैसे-जैसे कक्षाएं ऊंची होती जाती हैं, ड्रॉपआउट दर तेजी से बढ़ती है। माध्यमिक स्तर के बाद 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे पूरी तरह शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं।
सरकार के दिए कारणों पर आपत्ति, सिस्टम की कमियां मुख्य वजह
सरकार ने ड्रॉपआउट के मुख्य कारणों के रूप में गरीबी, खराब स्वास्थ्य और घरेलू काम बताए थे, लेकिन सांसद बेनीवाल ने इन पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने सवाल उठाया:यदि गरीबी मुख्य वजह है, तो स्कॉलरशिप, पोषण, परिवहन और आवासीय स्कूलों की प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं दिख रही?स्वास्थ्य समस्या है, तो स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम और पोषण योजनाएं कागजों तक ही क्यों सीमित हैं?यदि बच्चे घरेलू श्रम में लगे हैं, तो बाल संरक्षण और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ किसे मिल रहा है?उन्होंने कहा कि ये सभी मुद्दे सरकार की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी हैं। नीतिगत विफलताओं को बच्चों और अभिभावकों के सिर नहीं मढ़ा जा सकता।
बुनियादी ढांचे और शिक्षकों की भारी कमी
सांसद ने क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था की अन्य गंभीर कमियों पर भी प्रकाश डाला:लगभग 70 प्रतिशत शिक्षक पद रिक्त हैं।करीब 50 प्रतिशत स्कूलों में भवन, कक्षाएं, शौचालय और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।एक ही शिक्षक पर कई कक्षाएं थोपी जा रही हैं, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता, नियमित अध्यापन और छात्रों की निगरानी पूरी तरह चरमरा गई है।बेनीवाल ने कहा, "बच्चे स्कूल नहीं छोड़ रहे, बल्कि सिस्टम उन्हें छोड़ने पर मजबूर कर रहा है।"
उच्च स्तर के आंकड़े छुपाने और विशेष नीति की मांग
सांसद ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति और समग्र शिक्षा अभियान की जमीनी विफलता पर सवाल उठाते हुए पूछा कि सीमावर्ती और पिछड़े इलाकों में हालात बद से बदतर क्यों हो रहे हैं। उन्होंने सरकार से ये भी पूछा:उच्च माध्यमिक और उच्च शिक्षा के ड्रॉपआउट आंकड़े क्यों छुपाए जा रहे हैं?रेगिस्तानी व सीमावर्ती जिलों के लिए अलग क्षेत्र-विशेष शिक्षा नीति कब बनेगी?स्कूलों के विलय (मर्जर) से उत्पन्न असुविधाओं और शिकायतों के निवारण पर भी सवाल उठाए, जबकि मंत्री ने बजट जारी होने और क्रियान्वयन चलने का जवाब दिया।