मुर्गी का कलेजा देखकर सुनाया फैसला, ‘ये चोर नहीं’: ससुराल पहुंचते ही बलि देती है दुल्हन, जानवरों के कटे सिर को मंदिर मानता है गालो समुदाय
अरुणाचल प्रदेश के गालो समुदाय में आज भी चोरी और अपराध का फैसला अनोखी परंपराओं से किया जाता है। मुर्गी की बलि, टाइगर के दांत की कसम, जहरीले तीर, जानवरों के कंकाल वाले मंदिर और मिथुन की पूजा जैसी परंपराएं इस जनजाति को बेहद रहस्यमयी बनाती हैं।
अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसे गालो समुदाय की दुनिया आज भी रहस्य और परंपराओं से भरी हुई है। करीब 80 हजार की आबादी वाला यह समुदाय अपनी अनोखी मान्यताओं और रीति-रिवाजों के कारण पूरे देश में अलग पहचान रखता है। यहां आज भी कई मामलों में इंसाफ अदालतों में नहीं, बल्कि पारंपरिक तरीकों से किया जाता है।
राजधानी ईटानगर से करीब 140 किलोमीटर दूर यीगीकन्न बस्ती में एक युवक पर धान चोरी का आरोप लगा। गांव के पुरोहित मोगी ओरी ने पारंपरिक रीति से उसकी सुनवाई की। बाघ की खाल का जैकेट पहने, कंधे पर धनुष और जहरीले तीरों से भरा तरकश लिए पुरोहित ने पहले मुर्गी की बलि दी और फिर उसके कलेजे के जरिए सच और झूठ का पता लगाने की प्रक्रिया शुरू की। युवक से टाइगर के दांत पर हाथ रखकर कसम खिलाई गई और अंत में उसे निर्दोष घोषित कर दिया गया।
गालो समुदाय में टाइगर के दांत को बेहद पवित्र माना जाता है। यह सिर्फ पुरोहित पहनते हैं और माना जाता है कि इसके सामने झूठ बोलने वाले के साथ बुरा होता है। वहीं इनके तीरों पर ‘पाएजन’ नाम के जहरीले पौधे का लेप लगाया जाता है, जिससे एक ही वार जानलेवा साबित हो सकता है।
इस समुदाय के घरों में बने मंदिर भी बेहद अलग होते हैं। यहां जंगली सूअर और हिरण के कंकाल टांगे जाते हैं। माना जाता है कि शिकार किए गए जानवरों की पूजा न की जाए तो उनकी आत्मा नाराज हो सकती है। कई बार बीमारी या अन्य समस्याओं को भी जानवरों की आत्मा से जोड़कर देखा जाता है।
गालो समुदाय में मिथुन को विशेष महत्व दिया जाता है। मिथुन अरुणाचल प्रदेश का राजकीय पशु है और इसे पूजनीय माना जाता है। एक लोककथा के अनुसार, मिथुन ने गुफा का रास्ता खोलकर गालो लोगों को नया जीवन दिया था। शादी-ब्याह में भी मिथुन की बड़ी भूमिका होती है और दहेज में मिथुन व गाय देने की परंपरा आज भी निभाई जाती है।
हर साल अप्रैल में गालो समुदाय मोपिन उत्सव मनाता है। इस दौरान लोग एक-दूसरे के चेहरे पर चावल का आटा लगाते हैं और मिथुन की बलि दी जाती है। समुदाय का मानना है कि इससे दुख दूर होते हैं और सुख-समृद्धि आती है।
गालो समुदाय सूर्य और चंद्रमा की पूजा करता है। वहीं मृत्यु के बाद शव को जलाने के बजाय दफनाने की परंपरा है। अंतिम संस्कार के दौरान पूरी रात गीत गाए जाते हैं और पशुओं की बलि दी जाती है।
आधुनिकता के दौर में भी गालो समुदाय अपनी सदियों पुरानी परंपराओं और मान्यताओं को मजबूती से जीवित रखे हुए है।