राजस्थान के बाड़मेर जिले में गोबर गैस प्लांट की सफलता: 50 से ज्यादा घरों में गैस सिलेंडर की जरूरत नहीं, चूल्हे जल रहे हैं बायोगैस से

राजस्थान के बाड़मेर जिले में 50 से अधिक घरों में गोबर गैस प्लांट लगे हैं, जहां किसान गाय-भैंस के गोबर से बायोगैस बनाकर रसोई चला रहे हैं। गैस सिलेंडर की जरूरत नहीं पड़ती, सब्सिडी पर प्लांट लगे (जैसे हरिराम भाखर ने 40 हजार सब्सिडी पर 15-17 हजार में लगाया)। निकलने वाली स्लरी जैविक खाद के रूप में खेती में उपयोग हो रही है, जिससे रासायनिक उर्वरक कम हो रहे हैं। यह पर्यावरण-अनुकूल, सस्ता और आत्मनिर्भरता बढ़ाने वाला विकल्प है, खासकर पशुपालन वाले क्षेत्रों में।

Mar 23, 2026 - 10:23
राजस्थान के बाड़मेर जिले में गोबर गैस प्लांट की सफलता: 50 से ज्यादा घरों में गैस सिलेंडर की जरूरत नहीं, चूल्हे जल रहे हैं बायोगैस से

बाड़मेर जिला, जो राजस्थान के पश्चिमी हिस्से में स्थित है और जहां पशुपालन किसानों की मुख्य आजीविका है, वहां एक अनोखी क्रांति देखने को मिल रही है। जिले के कई गांवों में गोबर गैस प्लांट (बायोगैस प्लांट) लगाए गए हैं, जिनकी संख्या 50 से अधिक है। इन प्लांटों के जरिए ग्रामीण परिवार न केवल रसोई में खाना पका रहे हैं, बल्कि गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों और उपलब्धता की समस्या से भी मुक्त हो गए हैं। यह पर्यावरण-अनुकूल और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है।

हरिराम भाखर की प्रेरक कहानी

जानपालिया गांव (सेड़वा क्षेत्र) के निवासी प्रगतिशील किसान हरिराम भाखर इस बदलाव के सबसे अच्छे उदाहरण हैं। करीब 4 साल पहले उन्होंने गोबर गैस प्लांट लगवाया। एक एनजीओ की मदद से उन्हें 40 हजार रुपये की सब्सिडी मिली, जिसके बाद कुल खर्च लगभग 15-17 हजार रुपये आया। अब उनके घर में पिछले चार साल से सभी सदस्यों का खाना इसी बायोगैस से बनता है।

हरिराम बताते हैं, "गैस सिलेंडर की जरूरत नहीं पड़ती। न सिलेंडर लाने की परेशानी है, न बुकिंग की। गोबर गैस से ही दोनों वक्त का खाना पकता है और बचा हुआ अपशिष्ट (स्लरी) बागवानी और खेती में काम आता है।" उनके घर में गाय-भैंस के गोबर से रोजाना पर्याप्त गैस बनती है, जो सीधे रसोई के चूल्हे तक पाइपलाइन के जरिए पहुंचती है।

जिले के कई गांवों में फैली यह तकनीक

यह सुविधा केवल जानपालिया तक सीमित नहीं है। बाड़मेर जिले के कई अन्य इलाकों में भी गोबर गैस प्लांट सफलतापूर्वक चल रहे हैं। इनमें शामिल गांव हैं:ईशरोल,लीलसर,कापराऊ,आलमसर,महावीर गोशाला (चौहटन),सेड़वा के जानपालिया,बिसासर,भंवार,भूणिया,गुड़ामालानी के आडेल,अर्जुन की ढाणी,ढीमड़ी,सिणधरी,सवाऊ पदम सिंह,बायतु,नोखड़ा,धोरीमन्ना,इन क्षेत्रों में कुल 50 से ज्यादा घरों में बायोगैस का उपयोग हो रहा है। विशेष रूप से पशुपालन वाले परिवारों के लिए यह तकनीक वरदान साबित हो रही है।

स्लरी: जैविक खाद का बेहतरीन स्रोत

प्लांट से निकलने वाली स्लरी (बचा हुआ घोल) को खेतों में डाला जाता है। यह यूरिया और डीएपी की जगह ले रही है और केंचुआ खाद (वर्मीकंपोस्ट) के बराबर उपयोगी मानी जाती है। स्लरी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की अच्छी मात्रा होती है, जिससे मिट्टी की उर्वरकता बनी रहती है। किसान इसे बागवानी, फसलों और सब्जियों में इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हुई है और जैविक खेती को बढ़ावा मिला है।

गोबर गैस कैसे बनती है?

प्रक्रिया सरल है: गाय-भैंस के गोबर और पानी का घोल तैयार किया जाता है।इसे एक बंद टैंक (डाइजेस्टर) में डाला जाता है।ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में बैक्टीरिया गोबर को सड़ाते हैं, जिससे मीथेन गैस (मुख्य रूप से बायोगैस) बनती है।यह गैस पाइप के जरिए सीधे रसोई के चूल्हे तक पहुंचाई जाती है।जानकारों के अनुसार, जिन घरों में कम से कम 2 पशु हैं, वहां भी यह प्लांट लगाया जा सकता है और रसोई के लिए पर्याप्त गैस मिल सकती है। पहली बार गैस बनने में सामान्यतः 30-35 दिन लगते हैं, लेकिन उसके बाद नियमित उत्पादन होता है।

विशेषज्ञों की राय

पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. नारायण सिंह के अनुसार, गोबर गैस सस्ता, पर्यावरण-अनुकूल और स्वच्छ ईंधन है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पशुपालन मुख्य व्यवसाय है, वहां यह तकनीक एलपीजी पर निर्भरता को काफी कम कर सकती है। खासकर वर्तमान समय में ईरान-इजराइल युद्ध जैसी वैश्विक स्थितियों से एलपीजी की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच यह विकल्प बहुत उपयोगी साबित हो रहा है।

Mohit Parihar Mohit Parihar is a journalist at The Khatak, covering politics and public issues with a strong focus on ground reporting and factual storytelling.