सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को दी मंजूरी: बोला- चुनाव आयोग ने कानूनी दायरे में रहकर किया काम
सुप्रीम Court ने चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को वैध ठहराते हुए कहा कि आयोग अपने कानूनी अधिकारों के भीतर काम कर रहा है। कोर्ट ने माना कि वोटर लिस्ट को शुद्ध और अपडेट रखने के लिए यह प्रक्रिया जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) द्वारा कराई जा रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को सही ठहराते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह नहीं माना जा सकता कि चुनाव आयोग ने SIR के जरिए अपने कानूनी अधिकारों से बाहर जाकर कोई कार्रवाई की है। अदालत ने यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए इस प्रक्रिया को गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह सामान्य प्रक्रिया से अलग तरीके से की गई।
यह फैसला उन याचिकाओं पर आया, जिनमें बिहार समेत कई राज्यों में कराए गए SIR अभियान को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इस प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए और चुनाव आयोग ने नागरिकता जांच एजेंसी की तरह काम किया।
क्या है SIR प्रक्रिया?
SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन चुनाव आयोग की एक विशेष प्रक्रिया है, जिसके जरिए मतदाता सूची को अपडेट किया जाता है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई योग्य मतदाता सूची से बाहर न रहे और कोई अयोग्य व्यक्ति वोटर लिस्ट में शामिल न हो।
इस प्रक्रिया के तहत:
- 18 साल से अधिक उम्र के नए वोटर्स को जोड़ा जाता है।
- मृत या दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके लोगों के नाम हटाए जाते हैं।
- नाम, पता और अन्य जानकारियों में हुई गलतियों को सुधारा जाता है।
- BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) घर-घर जाकर फॉर्म भरवाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चुनाव आयोग का दायित्व निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करना है। कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट की शुद्धता बनाए रखने के लिए आयोग को समय-समय पर विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया चलाने का अधिकार है।
अदालत ने यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए SIR को अवैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह सामान्य वार्षिक पुनरीक्षण से अलग प्रक्रिया है।
हालांकि कोर्ट ने पहले सुनवाई के दौरान यह जरूर कहा था कि वह यह तय करेगा कि चुनाव आयोग को इस तरह का विशेष अभियान चलाने का अधिकार है या नहीं। अब अंतिम फैसले में अदालत ने आयोग के अधिकारों को वैध माना है।
याचिकाकर्ताओं ने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ताओं में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), PUCL समेत कई सामाजिक संगठन और विपक्षी नेताओं ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इनमें मनोज झा, योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा, केसी वेणुगोपाल, पप्पू यादव और RJD सांसद सुधाकर सिंह जैसे नाम शामिल थे।
याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि:
- विधानसभा चुनावों से ठीक पहले बड़े पैमाने पर SIR चलाया गया।
- इससे लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हट गए।
- चुनाव आयोग ने नागरिकता सत्यापन की भूमिका निभानी शुरू कर दी।
- पहले से रजिस्टर्ड वोटर्स पर खुद को भारतीय नागरिक साबित करने का दबाव डाला गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नागरिकता तय करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है, चुनाव आयोग के पास नहीं।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग ने कोर्ट में SIR का बचाव करते हुए कहा कि निष्पक्ष चुनाव कराना उसका संवैधानिक दायित्व है। आयोग ने कहा कि वह किसी की कानूनी नागरिकता तय नहीं कर रहा, बल्कि सिर्फ चुनावी उद्देश्यों के लिए मतदाता सूची को शुद्ध कर रहा है।
आयोग के मुताबिक SIR का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सिर्फ वैध भारतीय नागरिक ही वोट डाल सकें।
बिहार में SIR के बाद क्या बदला?
बिहार में चुनाव आयोग ने 1 अक्टूबर 2025 को SIR की फाइनल वोटर लिस्ट जारी की थी। इसके बाद राज्य में मतदाताओं की संख्या करीब 6% घटकर 7.42 करोड़ रह गई।
आंकड़ों के मुताबिक:
- कुल 69.29 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए।
- 21.53 लाख नए वोटर्स जोड़े गए।
- 22.34 लाख लोग मृत पाए गए।
- 6.85 लाख लोगों के नाम दो जगह दर्ज थे।
- 36.44 लाख लोग दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके थे।
पटना में वोटर्स बढ़े, सारण में घटे
फाइनल SIR लिस्ट में पटना जिले में 1.63 लाख मतदाता बढ़े। पहले यहां 46.51 लाख वोटर्स थे, जो बढ़कर 48.15 लाख हो गए।
वहीं सारण जिले में 2.24 लाख वोटर्स के नाम हटे। यहां मतदाताओं की संख्या 31.27 लाख से घटकर 29.02 लाख रह गई।
कई राज्यों में जारी है प्रक्रिया
बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। वहीं उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान समेत कई राज्यों में यह प्रक्रिया अभी जारी है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब चुनाव आयोग को देशभर में वोटर लिस्ट शुद्धिकरण अभियान जारी रखने को कानूनी मजबूती मिल गई है।