कटऑफ से 3 नंबर कम, फिर भी नहीं मानी हार—अभ्यर्थी ने खुद लड़ा केस; हाईकोर्ट ने की तारीफ, लेकिन याचिका खारिज

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने सिविल जज भर्ती-2024 की प्रारंभिक परीक्षा की आंसर-की और रिजल्ट को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता खुशबू चौधरी ने कटऑफ से 3 अंक कम आने पर खुद ही कोर्ट में पैरवी की, जिसकी कोर्ट ने सराहना की। हालांकि, कोर्ट ने माना कि एक्सपर्ट कमेटी के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता और चार प्रश्नों पर उठाई गई आपत्तियों को खारिज कर दिया।

Mar 20, 2026 - 16:32
कटऑफ से 3 नंबर कम, फिर भी नहीं मानी हार—अभ्यर्थी ने खुद लड़ा केस; हाईकोर्ट ने की तारीफ, लेकिन याचिका खारिज

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने सिविल जज कैडर भर्ती-2024 की प्रारंभिक परीक्षा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका एक अभ्यर्थी द्वारा दायर की गई थी, जिसने कटऑफ से मात्र 3 अंक कम आने के बावजूद अपने दम पर कोर्ट में पैरवी की। कोर्ट ने अभ्यर्थी के इस साहस और मेहनत की सराहना की, लेकिन कानूनी आधार पर राहत देने से इनकार कर दिया।

खुद लड़ा केस, कोर्ट ने की सराहना

याचिकाकर्ता खुशबू चौधरी ने बिना किसी वकील की मदद के खुद ही कोर्ट में अपनी बात रखी। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता ने पूरी ईमानदारी, स्पष्ट सोच और दृढ़ता के साथ अपनी दलीलें पेश कीं। कोर्ट ने इस प्रयास को “सराहनीय” बताया और इसे रिकॉर्ड पर दर्ज किया।

क्या था पूरा मामला

खुशबू चौधरी ने 9 अप्रैल 2024 को सिविल जज भर्ती के लिए आवेदन किया था। 23 जून 2024 को हुई प्रारंभिक परीक्षा के बाद 25 जून को मॉडल आंसर-की जारी हुई, जिस पर आपत्तियां मांगी गईं।15 जुलाई 2024 को घोषित परिणाम में कटऑफ 68 अंक रही, जबकि खुशबू को 65 अंक मिले। चयन न होने पर उन्होंने चार प्रश्नों (11, 51, 91 और 92) के उत्तरों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

कोर्ट में उठे मुख्य मुद्दे और फैसला

1. प्रश्न 91 और 92 पर विवाद

याचिकाकर्ता का कहना था कि अंग्रेजी ग्रामर के इन सवालों के उनके उत्तर सही थे, लेकिन एक्सपर्ट कमेटी ने अस्पष्टता के कारण इन्हें हटा दिया।कोर्ट ने कहा कि इन प्रश्नों को सभी अभ्यर्थियों के लिए समान रूप से हटाया गया है। यदि केवल याचिकाकर्ता को लाभ दिया जाता है तो यह अन्य अभ्यर्थियों के साथ भेदभाव होगा।

2. प्रश्न 51 पर आपत्ति

यह सवाल एक ही अपराध में दो बार मुकदमा चलाने से संबंधित था। याचिकाकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 300 का हवाला देते हुए अपना उत्तर सही बताया।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 300(4) एक सीमित अपवाद है। साथ ही कहा कि यदि इस प्रश्न का एक अंक भी दे दिया जाए, तब भी याचिकाकर्ता के कुल अंक 66 ही होंगे, जो कटऑफ से कम हैं।

3. प्रश्न 11 पर तर्क

यह प्रश्न कानूनी व्याख्या के नियम से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने 'Rule of Ejusdem Generis' को सही उत्तर बताया, जबकि आंसर-की में 'Rule of Homogenous Interpretation' दिया गया था।कोर्ट ने ‘ब्लैक्स लॉ डिक्शनरी’ का हवाला देते हुए कहा कि दोनों सिद्धांत मूल रूप से एक ही हैं। हालांकि कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को विषय की सही समझ थी, लेकिन विकल्पों में लैटिन शब्द न होने से भ्रम हुआ।

एक्सपर्ट कमेटी के फैसले में हस्तक्षेप नहीं

खंडपीठ ने अपने फैसले में साफ किया कि जब तक एक्सपर्ट कमेटी का निर्णय स्पष्ट रूप से मनमाना या विकृत न हो, तब तक कोर्ट उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

निष्कर्ष

भले ही खुशबू चौधरी को इस मामले में राहत नहीं मिली, लेकिन उनके आत्मविश्वास और खुद केस लड़ने के जज्बे को कोर्ट ने खुलकर सराहा। यह मामला उन अभ्यर्थियों के लिए मिसाल है जो अपने अधिकारों के लिए खुद आगे आकर लड़ने का साहस रखते हैं।

Mohit Parihar Mohit Parihar is a journalist at The Khatak, covering politics and public issues with a strong focus on ground reporting and factual storytelling.