TMC को बड़ा झटका: कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने दिया इस्तीफा, ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ीं
तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है। हकीम ने कहा कि वह पहले की तरह काम नहीं कर पा रहे थे।
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुक्रवार को एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले हकीम के इस फैसले को पार्टी के लिए एक बड़े राजनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है।
इस्तीफे की घोषणा करते हुए फिरहाद हकीम ने कहा कि वह पहले की तरह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में पद पर बने रहना उस जिम्मेदारी और कुर्सी का सम्मान नहीं होता, जिसे उन्होंने वर्षों तक संभाला है।
"पहले की तरह काम नहीं कर पा रहा था" : हकीम
मीडिया से बातचीत में फिरहाद हकीम ने कहा,
"मैं पहले की तरह काम नहीं कर पा रहा हूं। इसलिए मैंने इस्तीफा दे दिया। अगर मैं पद पर बना रहता तो यह उस कुर्सी का अपमान होता, जिस पर मैं बैठा था। जो भी इस पद को आगे संभालेगा, उसे मेरी शुभकामनाएं।"
67 वर्षीय नेता ने राज्य के नए राजनीतिक नेतृत्व से जनता की उम्मीदों को पूरा करने की भी अपील की। उनके बयान को राज्य की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ममता बनर्जी से मांगी थी इस्तीफे की अनुमति
सूत्रों के अनुसार फिरहाद हकीम ने कुछ समय पहले ही तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से पद छोड़ने की इच्छा जताई थी। उस समय पार्टी नेतृत्व ने उन्हें इस्तीफा न देने की सलाह दी थी।
हालांकि शुक्रवार को उन्होंने एक बार फिर मुख्यमंत्री से पद छोड़ने की अनुमति मांगी, जिसके बाद ममता बनर्जी ने उनकी मांग स्वीकार कर ली। टीएमसी विधायक कुणाल घोष ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि हकीम काफी समय से इस विषय पर पार्टी नेतृत्व से चर्चा कर रहे थे।
कोलकाता के पहले मुस्लिम मेयर रहे हकीम
फिरहाद हकीम पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक बड़ा चेहरा रहे हैं। वह कोलकाता पोर्ट विधानसभा क्षेत्र से चार बार विधायक चुने गए और राज्य सरकार में मंत्री भी रहे।
नवंबर 2018 में उन्हें कोलकाता का मेयर नियुक्त किया गया था। वह स्वतंत्रता के बाद कोलकाता के पहले मुस्लिम मेयर बने थे। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने शहरी विकास, नागरिक सुविधाओं और नगर प्रशासन से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों में भूमिका निभाई।
टीएमसी में बढ़ती अंदरूनी कलह
हकीम का इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब तृणमूल कांग्रेस अंदरूनी राजनीतिक संकट से गुजर रही है। हाल के महीनों में पार्टी के भीतर असंतोष और गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आती रही हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कई विधायकों के पार्टी से अलग होने और अलग गुट बनाने की घटनाओं ने भी टीएमसी की चुनौतियां बढ़ा दी हैं।
नेता प्रतिपक्ष को लेकर विवाद ने बढ़ाई परेशानी
टीएमसी के भीतर विवाद तब और बढ़ गया जब पार्टी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को एक गुट ने अपना नेता घोषित कर दिया। बाद में विधानसभा अध्यक्ष द्वारा उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दिए जाने से राजनीतिक तनाव और गहरा गया।
विवाद उस समय और बढ़ गया जब नेता प्रतिपक्ष के चयन से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर जाली होने के आरोप लगे। पार्टी ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को निष्कासित कर दिया, जबकि दोनों नेताओं ने आरोपों से इनकार किया।
इस पूरे घटनाक्रम ने टीएमसी के भीतर चल रहे मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया और पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दीं।
ममता बनर्जी के सामने नई चुनौती
फिरहाद हकीम को ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिना जाता रहा है। ऐसे में उनका इस्तीफा केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में सत्ता गंवाने के बाद टीएमसी को संगठनात्मक मजबूती बनाए रखने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हकीम का पद छोड़ना पार्टी के भीतर जारी अस्थिरता की ओर भी इशारा करता है।
अब कौन बनेगा कोलकाता का नया मेयर?
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि कोलकाता नगर निगम की कमान अब किसे सौंपी जाएगी। टीएमसी नेतृत्व की ओर से अभी तक किसी नए नाम की घोषणा नहीं की गई है।
राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी नेतृत्व किस चेहरे पर भरोसा जताता है। आने वाले दिनों में कोलकाता के नए मेयर की नियुक्ति और टीएमसी की आंतरिक राजनीति पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।
हकीम के इस्तीफे ने न केवल कोलकाता नगर प्रशासन बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी नई बहस छेड़ दी है। अब देखना होगा कि ममता बनर्जी इस संकट से पार्टी को कैसे बाहर निकालती हैं और संगठन में स्थिरता कैसे कायम रखती हैं।