आंखों पर पट्टी, फिर भी रंगों की पहचान! चित्तौड़गढ़ के शिविर में बच्चों की ‘सिक्स्थ सेंस’ ट्रेनिंग का दावा
चित्तौड़गढ़ में आर्यवीर दल के शिविर में बच्चों को योग, मेडिटेशन और ब्रेन एक्सरसाइज के जरिए ‘सिक्स्थ सेंस डेवलपमेंट’ की ट्रेनिंग दी गई। शिविर में दावा किया गया कि बच्चे आंखों पर पट्टी बंधी होने के बावजूद रंग पहचानने, कार्ड पढ़ने और हाथों के मूवमेंट समझने में सक्षम हो रहे हैं।
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में आयोजित एक विशेष शिविर इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां बच्चों को योग, मेडिटेशन और मानसिक अभ्यास के जरिए ऐसी ट्रेनिंग दी जा रही है, जिसे आयोजक “सिक्स्थ सेंस डेवलपमेंट” और “थर्ड आई प्रैक्टिस” का नाम दे रहे हैं।
शिविर में दावा किया गया कि बच्चे आंखों पर पट्टी बंधी होने के बावजूद रंग पहचान सकते हैं, कार्ड पर लिखे शब्द बता सकते हैं और सामने मौजूद व्यक्ति के हाथों के मूवमेंट तक समझ सकते हैं।
आंखों पर पट्टी, फिर भी रंगों की पहचान
यह शिविर चित्तौड़गढ़ के श्री गुरुकुल में 19 से 28 मई तक आयोजित किया गया। इसमें राजस्थान के 22 जिलों से करीब 300 बच्चों ने हिस्सा लिया।
शिविर में बच्चों की आंखों पर पहले रुई रखी गई और फिर कपड़े से पट्टी बांधी गई, ताकि देखने की कोई संभावना न रहे। इसके बाद बच्चों को अलग-अलग रंगों के कार्ड, ब्लॉक और आकृतियां दी गईं। ट्रेनर्स के अनुसार बच्चे उन्हें हाथों से रगड़कर, सूंघकर और महसूस करके रंग पहचानने की कोशिश करते हैं। कई बच्चे सही रंग और आकृतियों के नाम बताते नजर आए।
योग और मेडिटेशन से ‘थर्ड आई’ सक्रिय करने का दावा
शिविर के ट्रेनर भारद्वाज रतन का कहना है कि यह कोई चमत्कार या जादू नहीं, बल्कि अभ्यास और अनुभव की प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि बच्चों को नियमित योग, मेडिटेशन और ब्रेन एक्सरसाइज करवाई जाती हैं। इसके जरिए शरीर के विभिन्न चक्रों—
- क्राउन चक्र
- थर्ड आई चक्र
- थ्रोट चक्र
- हार्ट चक्र
- सोलर प्लेक्स चक्र
- रूट चक्र
को सक्रिय करने का अभ्यास कराया जाता है। ट्रेनर्स का दावा है कि जब बच्चे लंबे समय तक मानसिक रूप से शांत और एकाग्र होते हैं, तो उनकी संवेदनाएं अधिक सक्रिय हो जाती हैं।
कैसे करवाई जाती है ट्रेनिंग?
आचार्य नंद किशोर के मुताबिक, शिविर में बच्चों की दिनचर्या सुबह 4 बजे से शुरू होती है। पूरे दिन योग, ध्यान, हवन, जूडो-कराटे, लाठी, भाला और मानसिक अभ्यास जैसी गतिविधियां करवाई जाती हैं।
थर्ड आई प्रैक्टिस के दौरान बच्चों को आंखों पर पट्टी बांधकर अलग-अलग गतिविधियां करवाई जाती हैं।
- रंगों की पहचान
- कार्ड पढ़ना
- हाथों के मूवमेंट समझना
- ड्राइंग शीट में सही रंग भरना
- किताब पढ़ने का अभ्यास
जैसी एक्टिविटीज करवाई जाती हैं।
बच्चों ने बताए अपने अनुभव
निंबाहेड़ा से आए भविष्य योगी नामक छात्र ने बताया कि आंखों पर पट्टी बांधने के बाद उन्हें शरीर में अलग तरह का अनुभव होता है, जिसके आधार पर वे जवाब देने की कोशिश करते हैं। वहीं केकड़ी से आए सौम्य शर्मा ने कहा कि वे रंगों और अक्षरों को महसूस करके पहचानने की कोशिश करते हैं। उन्होंने बताया कि यह उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव है और वे आगे भी इसे सीखना चाहते हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
शिविर संचालकों का कहना है कि यह मानसिक एकाग्रता और संवेदनात्मक अभ्यास का हिस्सा है। हालांकि वैज्ञानिक स्तर पर इस तरह के दावों को लेकर हमेशा बहस होती रही है। कई विशेषज्ञ इसे बच्चों की संवेदनशीलता, स्मरण शक्ति और अभ्यास का परिणाम मानते हैं, जबकि कुछ लोग इसे मानसिक एकाग्रता की तकनीक बताते हैं।
क्या है आर्यवीर दल?
सार्वदेशिक आर्यवीर दल की स्थापना 1929 में हुई थी। संस्था का उद्देश्य संस्कृति की रक्षा, शक्ति का संचय और सेवा कार्य बताया जाता है। आयोजकों के अनुसार, इस शिविर के बाद 1 से 15 जून तक गुरुकुल कुरुक्षेत्र में सार्वदेशिक स्तर का शिविर आयोजित किया जाएगा।
आकर्षण का केंद्र बना ‘सिक्स्थ सेंस डेवलपमेंट’
चित्तौड़गढ़ का यह शिविर अब सोशल मीडिया और स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। आंखों पर पट्टी बांधकर बच्चों द्वारा रंग और गतिविधियां पहचानने के दावों ने लोगों की जिज्ञासा बढ़ा दी है।