Panchayat-Nikay Elections: हाईकोर्ट की डेडलाइन खत्म, चुनाव टले तो बढ़ेंगी आयोग की मुश्किलें
राजस्थान में पंचायत-निकाय चुनाव की हाईकोर्ट डेडलाइन खत्म हो गई है। चुनाव टलने की स्थिति में राज्य निर्वाचन आयोग को मतदाता सूचियां दोबारा तैयार करनी पड़ सकती हैं।
राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव को लेकर सियासी और प्रशासनिक हलचल अपने चरम पर है। बुधवार को हाईकोर्ट द्वारा तय की गई महत्वपूर्ण डेडलाइन पूरी हो रही है, लेकिन अब तक चुनाव नहीं हो पाने से कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
दरअसल, हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2025 को आदेश दिया था कि पंचायत-निकाय चुनाव के लिए परिसीमन प्रक्रिया 31 दिसंबर 2025 तक पूरी कर ली जाए और 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराए जाएं। अब जब यह समयसीमा खत्म हो चुकी है, तो राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग दोनों पर दबाव बढ़ गया है।
मामले ने कानूनी मोड़ भी ले लिया है। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा द्वारा दायर अवमानना याचिका पर हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह और आयोग के सचिव राजेश वर्मा को नोटिस जारी कर दिया है। इससे साफ है कि कोर्ट इस मामले को गंभीरता से देख रहा है।
वहीं, राज्य सरकार ने चुनाव टालने के लिए हाईकोर्ट में प्रार्थना पत्र भी पेश किया है। सरकार का तर्क है कि पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल दिसंबर 2026 तक पूरा हो रहा है, ऐसे में चुनाव को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से 10 जनवरी 2027 तक चुनाव नहीं कराने के लिए 8 कारण भी गिनाए हैं।
लेकिन अगर चुनाव अगले साल तक टलते हैं, तो राज्य निर्वाचन आयोग की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। दरअसल, मतदाता सूचियों का नियमित अपडेट होता है। यदि चुनाव 2027 में होते हैं, तो 1 जनवरी 2027 तक 18 साल पूरे करने वाले नए मतदाताओं को भी सूची में शामिल करना पड़ेगा। इसका मतलब है कि आयोग को पूरी मतदाता सूची नए सिरे से तैयार करनी होगी।
राज्य निर्वाचन आयोग ने फरवरी 2026 में ग्रामीण मतदाता सूचियों को अंतिम रूप दे दिया था, जबकि शहरी क्षेत्रों के लिए यह प्रक्रिया 22 अप्रैल और 8 मई 2026 तक पूरी होनी है। ऐसे में चुनाव टलने से अब तक की सारी तैयारी बेकार हो सकती है।
इस मुद्दे पर राजनीति भी तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने चुनाव में देरी को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि पंचायत-निकाय चुनाव लोकतंत्र का अहम हिस्सा हैं और इसमें देरी होना संविधान की भावना के खिलाफ है।
गहलोत ने यह भी कहा कि अगर समय पर चुनाव नहीं होते हैं, तो इस स्थिति में राज्यपाल और राष्ट्रपति को हस्तक्षेप करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है, जबकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पहले ही चुनाव कराने के निर्देश दे चुके हैं।
अब सबकी नजर हाईकोर्ट के अगले कदम पर टिकी है। यह देखना अहम होगा कि अदालत सरकार की दलीलों को मानती है या फिर समय पर चुनाव कराने के लिए सख्त निर्देश जारी करती है।