सच्चे प्रेम की अमर कहानी: रूपाराम और राजो देवी का साथी सफर हमेशा के लिए एक हो गया
राजस्थान के बाड़मेर जिले के धोरीमन्ना क्षेत्र के सुदाबेरी गांव में बुजुर्ग दंपति रूपाराम नाई (उम्र लगभग 80 वर्ष) और उनकी पत्नी राजो देवी ने सच्चे प्रेम की अनुपम मिसाल पेश की। दिन में राजो देवी का निधन हुआ, तो उनके सदमे से मात्र कुछ घंटों बाद रात में रूपाराम जी भी इस दुनिया से चले गए। दोनों की अर्थी एक साथ उठी और अंतिम संस्कार एक साथ हुआ। दशकों तक एक-दूसरे का सहारा बने इस जोड़े ने दिखाया कि सच्चा प्रेम मौत भी अलग नहीं कर सकती।
राजस्थान के थार रेगिस्तान की कठोर धरती पर, जहां जीवन हर पल संघर्ष से जूझता है, वहां प्रेम की एक ऐसी मिसाल सामने आई है जो सदियों तक लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी। बाड़मेर जिले के धोरीमन्ना उपखंड के पास सुदबेरी (सुदाबेरी) गांव में रहने वाले बुजुर्ग दंपति रूपाराम नाई (उम्र करीब 80 वर्ष) और उनकी पत्नी राजो देवी ने जीवन के अंतिम पलों में भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा। कल यानी 21 दिसंबर 2025 को दिन में राजो देवी ने इस दुनिया को अलविदा कहा, और मात्र कुछ घंटों बाद रात में रूपाराम जी ने भी आंखें हमेशा के लिए बंद कर लीं। मानो वे कह रहे हों – "साथ जिए, साथ ही जाएंगे।"
यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि सच्चाई है जो गांव वालों की आंखों देखी है। छोटी सी झोपड़ी में दशकों से साथ रहने वाले इस जोड़े ने राजस्थान की कठिन जिंदगी में एक-दूसरे का सहारा बनकर हर सुख-दुख बांटा। सूखा पड़े तो साथ खड़े रहे, पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष किया, बच्चों को बड़ा किया, पोते-पोतियों को गोद में खिलाया। त्योहारों में साथ हंसे, मुसीबतों में साथ रोए। कभी किसी से शिकायत नहीं की, कभी किसी को परेशान नहीं किया। गांव वाले बताते हैं कि रूपाराम जी और राजो देवी जीवन भर एक-दूसरे की छाया बने रहे। सात फेरों के वचन को उन्होंने न सिर्फ निभाया, बल्कि हर पल जीया।
कल का वह हादसा नहीं, बल्कि प्रेम का चरम था। दिन में राजो देवी की तबीयत बिगड़ी और वे चली गईं। उनके जाने के सदमे को रूपाराम जी सहन नहीं कर पाए। रात में उनकी सांसें भी थम गईं। गांव में मातम छा गया। लोग कह रहे थे – "ऐसा प्रेम तो आजकल किताबों या फिल्मों में भी दुर्लभ है।" दोनों की अर्थी एक साथ उठी, एक साथ चिता सजी और एक साथ अंतिम संस्कार हुआ। रेगिस्तान की रेत ने जैसे उनके आंसुओं को सोख लिया, लेकिन उनका प्रेम अमर हो गया।
आज के दौर में, जहां रिश्ते इतनी आसानी से टूट जाते हैं, रूपाराम जी और राजो देवी की यह जोड़ी एक जीती-जागती मिसाल है। उन्होंने दिखा दिया कि सच्चा प्रेम सिर्फ जीने तक नहीं, बल्कि मौत के बाद भी साथ निभाता है। पत्नी ने पति को अकेला नहीं जाने दिया, और पति ने भी जीवनसाथी के बिना इस दुनिया को खाली समझा। गांव वाले आज भी भावुक हैं, आंखें नम हैं, लेकिन दिल में संतोष है कि उन्होंने प्रेम की पराकाष्ठा देख ली।
यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम शब्द नहीं, कर्म है। वचन है, जो जीवन भर निभाने पड़ते हैं। रूपाराम जी और राजो देवी जैसी जोड़ियां याद दिलाती हैं कि सच्चा साथी वही है जो अंतिम सांस तक साथ खड़ा रहे। मौत भी उन्हें अलग नहीं कर सकी, क्योंकि उनकी आत्माएं हमेशा से एक थीं।