ईरान-इजराइल युद्ध के कारण हजारों स्टेपी ईगल राजस्थान पहुंचे: रेगिस्तानी जिलों में बनाए ठिकाने, बीमारियां फैलने की आशंका
ईरान-इजराइल युद्ध के कारण मध्य पूर्व में आवास उजड़ने से हजारों स्टेपी ईगल (बाज) राजस्थान पहुंच गए हैं। बीकानेर के जोड़बीड़ में 2200 से अधिक और जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में करीब 1700 स्टेपी ईगल रुके हैं, जो पिछली बार से दोगुनी संख्या है। ज्यादातर किशोर पक्षी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पारिस्थितिक असंतुलन और बीमारियों (जैसे बर्ड फ्लू) का रेड फ्लैग है। जोड़बीड़ अब स्टेपी ईगल के संरक्षण में भी नई पहचान बना रहा है।
ईरान-इजराइल युद्ध की आंच अब पक्षी जगत तक पहुंच गई है। मध्य पूर्व में चल रही अस्थिरता और आवास विनाश के कारण हजारों स्टेपी ईगल (बाज) ने राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों को अपना अस्थायी ठिकाना बना लिया है। यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में ये प्रवासी पक्षी एक साथ यहां रुके हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह न सिर्फ इन पक्षियों की मजबूरी को दर्शाता है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित खतरे की भी चेतावनी है।
अभूतपूर्व संख्या में पहुंचे स्टेपी ईगल
बीकानेर के जोड़बीड़ क्षेत्र में इस बार 2200 से ज्यादा स्टेपी ईगल दर्ज किए गए हैं, जो पिछले वर्षों की तुलना में लगभग दोगुनी संख्या है। पिछली बार यहां करीब 1200 बाज देखे गए थे। वहीं, जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में इनकी संख्या लगभग 1700 बताई जा रही है।
ये पक्षी रूस-मंगोलिया से उड़कर हर साल ईरान-इराक की ओर जाते थे, लेकिन अब युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित जगह न मिलने के कारण उन्होंने राजस्थान की ओर रुख किया है। इनका सफर करीब 25 दिनों का होता है। इस बार दो बड़े झुंड बीकानेर के जोड़बीड़ और जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में रुके हैं।
खास बात यह है कि इनमें 70 प्रतिशत किशोर (जुवेनाइल) पक्षी हैं, जिनकी उम्र 2 साल से भी कम है। इतनी बड़ी संख्या और ज्यादातर युवा पक्षियों का होना विशेषज्ञों को भी हैरान कर रहा है।
युद्ध ने उजाड़े आवास, भारत बने शरणस्थली
बीकानेर के वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट डॉ. दाऊ लाल बोहरा (जो पिछले 20 साल से गिद्ध संरक्षण पर काम कर रहे हैं) का कहना है कि मध्य एशिया, रूस और मंगोलिया से आने वाले स्टेपी ईगल पहले राजस्थान में बहुत कम संख्या में रुकते थे। पिछले 15 साल से ये नियमित रूप से आ रहे हैं, लेकिन पिछले तीन साल में संख्या धीरे-धीरे बढ़ी है।
जनवरी 2026 में डॉ. बोहरा ने बीकानेर, चूरू (ताल छापर और गंगीतासर), जैसलमेर और फलोदी में सर्वे किया। जोड़बीड़ से सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया। उनके अनुसार, ईरान-इजराइल युद्ध के कारण उस क्षेत्र में पक्षियों के आवास प्रभावित हुए हैं। ईरान-इराक में भी स्टेपी ईगल पहुंचते हैं, लेकिन वहां उनकी संख्या घटी है। परिणामस्वरूप ये भारत के सुरक्षित रेगिस्तानी इलाकों में शरण ले रहे हैं।ये पक्षी अप्रैल के अंत तक यहां रुकेंगे और फिर अपने मूल क्षेत्रों की ओर लौट जाएंगे।
जोड़बीड़ को मिल रही नई अंतरराष्ट्रीय पहचान
जोड़बीड़ क्षेत्र पहले से ही Important Bird Area (IBA) और Key Biodiversity Area (KBA) के रूप में मान्यता प्राप्त है। अब स्टेपी ईगल की वजह से इसे नई पहचान मिल रही है। दक्षिण एशिया में गिद्धों के सबसे बड़े जमावड़े के रूप में प्रसिद्ध जोड़बीड़ अब स्टेपी ईगल के लिए भी महत्वपूर्ण स्थल बन गया है।
2025 में 62 देशों की भागीदारी से ग्लोबल एक्शन प्लान तैयार किया गया था, जो 2026 से 2035 तक लागू होगा। भारत CMS (Convention on Migratory Species) का सदस्य होने के नाते इस अभियान में शामिल है। जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिजर्व को इस योजना में संरक्षण स्थल के रूप में चिह्नित किया गया है। स्टेपी ईगल को अम्ब्रेला स्पीशीज माना जाता है, यानी इसके संरक्षण से कई अन्य प्रजातियों को भी फायदा मिलता है।
रेड फ्लैग: पारिस्थितिक असंतुलन और बीमारी का खतरा
डॉ. बोहरा के अनुसार, इतनी बड़ी संख्या में एक साथ स्टेपी ईगल का आना अच्छी खबर नहीं है। यह रेड फ्लैग है। कारण:पारिस्थितिक असंतुलन की आशंका, संक्रामक बीमारियों (जैसे बर्ड फ्लू) का खतरा, आवास विनाश या मौसम परिवर्तन के कारण भोजन और सुरक्षा की तलाश में सामूहिक पलायन, साल 2008 में भी बीकानेर के जोड़बीड़ में 40 स्टेपी ईगल मर गए थे। वजह थी मृत पशुओं का मांस, जिन्हें गिद्धों के लिए डाला जाता है। पशुओं को दी जाने वाली दवाएं जैसे न्यूमेसुलाइड, डायक्लोफिनेक और एसिक्लोफिनेक इन बाजों के लिए घातक साबित हुई थीं। पर्यावरण प्रेमी अब मांग कर रहे हैं कि पशुओं को ऐसी दवाएं न दी जाएं।
विलुप्तप्राय प्रजाति, लेकिन राजस्थान में बढ़ती संख्या
स्टेपी ईगल को IUCN रेड लिस्ट में Endangered (विलुप्तप्राय) श्रेणी में रखा गया है। दुनिया भर में इनकी संख्या घट रही है, लेकिन राजस्थान में हर साल इनकी तादाद बढ़ती जा रही है। बीकानेर के अलावा ये चूरू, जोधपुर, बाड़मेर, हनुमानगढ़, नागौर और फलोदी में भी देखे जा चुके हैं।पश्चिमी राजस्थान अब इन प्रवासी बाजों का प्रमुख शीतकालीन ठिकाना बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संरक्षण प्रयास सही दिशा में रहे, तो ये क्षेत्र इनके लिए सुरक्षित आश्रय बने रह सकते हैं।