होलिका दहन कल: प्रदोष काल में श्रेष्ठ मुहूर्त, चंद्रग्रहण से प्रभावित होली की तैयारियां
होलिका दहन 2 मार्च को प्रदोष काल (सायं 6:43 से रात्रि 9:17 बजे) में श्रेष्ठ मुहूर्त बताया गया है, क्योंकि इस समय भद्रा का प्रभाव नहीं है। 3 मार्च को खग्रास/ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण लग रहा है, जो भारत में दिखाई देगा, लेकिन बाड़मेर-जैसलमेर और पश्चिमी गुजरात में मांद्य रूप में होने से इन क्षेत्रों में सूतक नियम लागू नहीं होंगे। इसलिए जोधपुर/राजस्थान के अधिकांश हिस्सों में 3 मार्च को धुलंडी (रंग वाली होली) मनाई जा सकती है, जबकि ग्रहण प्रभाव के कारण कुछ जगहों पर 4 मार्च को रंग खेलने की सलाह है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार पूर्णिमा 2 मार्च शाम 5:56 से शुरू होकर 3 मार्च शाम 5:08 तक रहेगी।
होली का त्योहार नजदीक आते ही उत्साह और रंग-बिरंगी तैयारियां जोर पकड़ रही हैं। बाजारों में रंग, गुलाल, पिचकारियां और होली के सामान सजने लगे हैं, जबकि घरों में होली गीतों की थाप और चंग की आवाजें गूंज रही हैं। लेकिन इस बार होलिका दहन और धुलंडी (रंग वाली होली) को लेकर लोगों के मन में काफी असमंजस है, मुख्य रूप से फाल्गुन पूर्णिमा तिथि, भद्रा काल और चंद्रग्रहण के कारण।
पूर्णिमा तिथि और होलिका दहन का समय
निर्णय सागर पंचांग और ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि 2 मार्च 2026 (सोमवार) को सायं 5:56 बजे शुरू हो रही है, जो 3 मार्च 2026 (मंगलवार) को सायं 5:08 बजे तक रहेगी। होलिका दहन पारंपरिक रूप से फाल्गुन पूर्णिमा पर प्रदोष काल में किया जाता है।
ज्योतिषी पं. सतीराम गौड़ और सुनील जोशी के अनुसार, इस वर्ष 2 मार्च को प्रदोष काल सायं 6:43 बजे से रात्रि 9:17 बजे तक रहेगा, जो होलिका दहन के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त माना जा रहा है। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि भद्रा निशीथकाल (मध्यरात्रि) के बाद तक रहे, तो प्रदोष में भद्रा का मुख छोड़कर दहन किया जा सकता है। इस बार प्रदोष काल में भद्रा का मुख नहीं है, इसलिए यह समय पूरी तरह शास्त्र-सम्मत है।
भद्रा और चंद्रग्रहण का प्रभाव
भद्रा काल को अशुभ माना जाता है, लेकिन इस वर्ष प्रदोष में इसका प्रभाव नहीं पड़ रहा। वहीं, 3 मार्च को खग्रास/ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण लग रहा है, जो भारत में दिखाई देगा। ग्रहण की स्थिति इस प्रकार है: ग्रहण का सूतक: 3 मार्च प्रातः 6:20 बजे से सायं 6:47 बजे तक।विरल छाया प्रभाव: दोपहर 2:14 बजे से।स्पर्श: दोपहर 3:20 बजे।मोक्ष: सायं 6:47 बजे। यह ग्रहण ग्रस्तोदित प्रकार का है, जिसमें चंद्रमा उदय होते समय ही पृथ्वी की छाया में होता है, इसलिए क्षितिज पर लाल या मलिन दिखाई देता है। पूर्ण चंद्रग्रहण नहीं है, बल्कि खग्रास/ग्रस्तोदित रूप में है।
बाड़मेर-जैसलमेर और पश्चिमी गुजरात में विशेष नियम
ग्रहण पश्चिमी राजस्थान (बाड़मेर, जैसलमेर) और मध्य/पश्चिमी गुजरात में मांद्य (पेनम्ब्रल) रूप में दिखाई देगा। इन क्षेत्रों में ग्रहण का वेध, सूतक, स्नान, दान, पुण्य कर्म आदि नियम लागू नहीं होंगे। इसलिए इन इलाकों में 3 मार्च को ही धुलंडी मनाई जा सकती है, बिना ग्रहण सूतक के प्रभाव के।
धुलंडी (रंग वाली होली) कब मनाई जाएगी?
चंद्रग्रहण के कारण अधिकांश क्षेत्रों में 3 मार्च को धार्मिक अनुष्ठान सीमित रहेंगे। कई ज्योतिषी और पंचांग सलाह देते हैं कि ग्रहण समाप्ति के बाद या अगले दिन रंग खेलें। इसलिए अधिकांश जगहों पर 4 मार्च 2026 (बुधवार) को रंगों की होली (धुलंडी) मनाई जाएगी।
होलिका दहन का महत्व और पूजा विधि
होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। होलिका की कहानी के अनुसार, प्रह्लाद की भक्ति से होलिका जलकर राख हो गई थी। दहन से पहले होलिका की पूजा, फल, गुड़, गाय का गोबर आदि चढ़ाए जाते हैं। प्रदोष काल में दहन करने से नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और परिवार में सुख-शांति आती है।