SaveAravalli अभियान: अरावली की रक्षा के लिए उठी आवाज
SaveAravalli अभियान सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समेत हजारों लोग अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदलकर शामिल हो रहे हैं। यह विरोध सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई नई परिभाषा के खिलाफ है, जिसमें 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली नहीं माना जाएगा, जिससे 90% क्षेत्र खनन के लिए खुल सकता है। अरावली थार रेगिस्तान की दीवार, NCR के फेफड़े और भूजल रिचार्ज जोन है – इसे बचाना उत्तर भारत के भविष्य के लिए जरूरी है। केंद्र और कोर्ट से पुनर्विचार की अपील की जा रही है।
आज सोशल मीडिया पर #SaveAravalli हैशटैग ट्रेंड कर रहा है। कई लोग, जिसमें राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी शामिल हैं, अपनी प्रोफाइल पिक्चर (DP) बदलकर इस अभियान से जुड़ रहे हैं। यह सिर्फ एक प्रतीकात्मक कदम नहीं है, बल्कि अरावली पहाड़ियों के संरक्षण के लिए एक मजबूत विरोध है। अभियान की शुरुआत उस विवादास्पद फैसले के खिलाफ हुई है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा स्वीकार की है।
क्या है विवाद की जड़? 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की अगुवाई वाली एक समिति की सिफारिशों को मंजूरी दी। नई परिभाषा के अनुसार:अरावली हिल: कोई भू-आकृति जो अपने आसपास के स्थानीय स्तर से 100 मीटर या इससे अधिक ऊंची हो।अरावली रेंज: दो या अधिक ऐसी पहाड़ियां जो एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में हों।इससे पहले फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) की परिभाषा ढलान, बफर जोन आदि पर आधारित थी। लेकिन नई परिभाषा से 90% से अधिक अरावली क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाएगा। FSI के आकलन के मुताबिक, राजस्थान के 15 जिलों में 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही 100 मीटर से ऊंची हैं।कोर्ट ने नई माइनिंग लीज पर रोक लगा दी है और सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तैयार करने का आदेश दिया है, लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि छोटी पहाड़ियां (गैपिंग एरिया) खनन के लिए खुल जाएंगी, जो अरावली की निरंतरता को तोड़ देंगी।
अरावली क्यों इतनी महत्वपूर्ण है? अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो गुजरात से दिल्ली तक 692 किमी फैली हुई है। यह उत्तर भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा कवच है:थार रेगिस्तान की दीवार: अरावली थार की रेत और गर्म हवाओं (लू) को दिल्ली, हरियाणा, यूपी के मैदानों तक पहुंचने से रोकती है। छोटी पहाड़ियां भी इस दीवार का हिस्सा हैं। अगर ये खत्म हुईं, तो रेगिस्तान फैलेगा और धूल भरी आंधियां बढ़ेंगी। प्रदूषण नियंत्रण: ये पहाड़ियां NCR के 'फेफड़े' हैं। धूल आंधियों को रोकती हैं और प्रदूषण कम करती हैं। दिल्ली में पहले से ही गंभीर प्रदूषण है – अरावली के बिना स्थिति और भयावह हो जाएगी। भूजल रिचार्ज: अरावली की चट्टानें बारिश का पानी जमीन में पहुंचाती हैं। यह मुख्य रिचार्ज जोन है। खनन से भूजल स्तर गिरेगा, पानी की कमी बढ़ेगी और वन्यजीव खतरे में पड़ेंगे।
अभियान की अपील अभियान चलाने वाले केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध कर रहे हैं कि परिभाषा पर पुनर्विचार किया जाए। अरावली को ऊंचाई या 'फीते' से नहीं, बल्कि उसके पर्यावरणीय योगदान से आंका जाए। वैज्ञानिकों का कहना है कि अरावली एक निरंतर श्रृंखला है – दीवार में एक ईंट निकालने से पूरी सुरक्षा टूट सकती है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश, अशोक गहलोत और पर्यावरण संगठनों ने इसे 'पारिस्थितिक विनाश का निमंत्रण' बताया है। गहलोत ने कहा, "यह फैसला भावी पीढ़ियों के साथ अन्याय है।"