“बसों के पहिए थमने की कगार पर… कर्मचारियों का बड़ा गुस्सा सड़कों पर उतरा, सिस्टम पर उठे सवाल!”

सरकारी परिवहन व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है, जहां कर्मचारियों ने अपनी लंबित मांगों और बढ़ते दबाव के खिलाफ जोरदार विरोध जताया। लंबे कार्य घंटे, भुगतान की अनदेखी और व्यवस्था में बदलाव को लेकर कर्मचारियों का गुस्सा सड़कों पर दिखाई दिया। इस आंदोलन ने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Apr 16, 2026 - 18:16
“बसों के पहिए थमने की कगार पर… कर्मचारियों का बड़ा गुस्सा सड़कों पर उतरा, सिस्टम पर उठे सवाल!”

जयपुर में गुरुवार को राजस्थान रोडवेज के सेवारत और सेवानिवृत कर्मचारियों ने अपनी लंबित मांगों और बढ़ते निजीकरण के विरोध में जोरदार प्रदर्शन किया। राजस्थान स्टेट रोडवेज एम्पलाइज यूनियन (AITUC) के बैनर तले कर्मचारियों ने जयपुर डिपो से रोडवेज मुख्यालय तक रैली निकाली और सरकार व प्रबंधन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।इसके बाद कर्मचारियों ने मुख्यालय के बाहर धरना देकर अपनी मांगों को तत्काल पूरा करने की मांग उठाई।

 क्या हैं कर्मचारियों की प्रमुख मांगें?

प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों ने कई गंभीर मुद्दे उठाए हैं, जिनमें सबसे प्रमुख हैं—

  • रोडवेज में निजीकरण पर रोक लगाई जाए
  • नई बसों की खरीद तुरंत शुरू की जाए
  • खाली पदों पर भर्ती की जाए
  • सेवानिवृत कर्मचारियों के लंबित भुगतान जारी किए जाएं
  • ओवरटाइम और अन्य भत्तों का भुगतान किया जाए

कर्मचारियों का कहना है कि अगर उनकी मांगों पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।

 12-15 घंटे ड्यूटी, फिर भी नहीं मिल रहा ओवरटाइम

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि कर्मचारियों से नियमों के खिलाफ 12 से 15 घंटे तक काम करवाया जा रहा है, जबकि नियम अनुसार 8 घंटे ड्यूटी तय है।

उनका कहना है कि—

  • अतिरिक्त काम का भुगतान नहीं किया जा रहा
  • न ही उन्हें पर्याप्त छुट्टियां मिल रही हैं
  • ओवरटाइम का पैसा लंबे समय से लंबित है

यह स्थिति कर्मचारियों के शोषण की ओर इशारा करती है।

निजीकरण को लेकर बढ़ी चिंता

यूनियन नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार धीरे-धीरे राजस्थान रोडवेज को निजीकरण की ओर धकेल रही है।

प्रदेशाध्यक्ष एमएल यादव के अनुसार—

  • पहले रोडवेज के पास लगभग 5500 बसें थीं
  • अब यह संख्या घटकर लगभग 2000 रह गई है
  • कर्मचारियों की संख्या भी लगातार कम हो रही है

कर्मचारियों का मानना है कि इससे रोडवेज की स्थिति कमजोर हो रही है और भविष्य खतरे में है।

 कानून उल्लंघन का भी आरोप

यूनियन ने यह भी आरोप लगाया कि रोडवेज प्रबंधन द्वारा मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर्स एक्ट-1969 का उल्लंघन किया जा रहा है।

कर्मचारियों के अनुसार—

  • तय समय से अधिक काम लिया जा रहा है
  • ओवरटाइम का भुगतान नहीं हो रहा
  • रिटायर्ड कर्मचारियों के नाइट अलाउंस और अन्य बकाया 7 साल से लंबित हैं

 आर्थिक संकट या भुगतान से इनकार?

प्रबंधन की ओर से कहा जा रहा है कि फंड की कमी के कारण भुगतान संभव नहीं हो पा रहा है। लेकिन कर्मचारी सवाल उठा रहे हैं कि—“अगर फंड नहीं है तो हमारा मेहनताना और बकाया पैसा आखिर जाएगा कहां?”यह सवाल पूरे विवाद को और गंभीर बना देता है।

 आगे क्या?

कर्मचारियों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें जल्द नहीं मानी गईं तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।इससे आने वाले दिनों में राजस्थान रोडवेज की सेवाओं पर असर पड़ने की संभावना भी जताई जा रही है।

 निष्कर्ष

राजस्थान रोडवेज में चल रहा यह विवाद केवल एक मजदूरी आंदोलन नहीं है, बल्कि यह सरकारी परिवहन व्यवस्था और निजीकरण की नीतियों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।अब देखना होगा कि सरकार और प्रबंधन इस मुद्दे को कैसे हल करते हैं—समझौते के जरिए या फिर बढ़ते आंदोलन के दबाव में।