“जब बेटी बनी ‘बेटा’: बृजेश कंवर ने पिता को दी मुखाग्नि, टूटीं सदियों पुरानी परंपराएं”

एक ऐसी भावुक कहानी सामने आई है, जिसने समाज की पुरानी परंपराओं को चुनौती दे दी। पिता की अंतिम विदाई के दौरान एक बेटी ने ऐसा कदम उठाया कि वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि रिश्तों की ताकत और बदलती सोच की एक गहरी मिसाल बन गया।

Apr 16, 2026 - 16:46
“जब बेटी बनी ‘बेटा’: बृजेश कंवर ने पिता को दी मुखाग्नि, टूटीं सदियों पुरानी परंपराएं”

सवाई माधोपुर से एक ऐसी भावुक और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने न सिर्फ लोगों की आंखें नम कर दीं, बल्कि समाज की पुरानी सोच को भी गहराई से झकझोर दिया। यह कहानी एक बेटी की है—जिसने अपने पिता को अंतिम विदाई देकर यह साबित कर दिया कि रिश्तों की ताकत लिंग नहीं, बल्कि प्रेम और संस्कार होते हैं।

अंतिम सफर में बदल गई परंपरा

बाल मंदिर कॉलोनी में उस दिन माहौल बेहद गमगीन था। ठाकुर मोहन सिंह राजावत के निधन के बाद जब उनकी अंतिम यात्रा शुरू हुई, तो हर किसी की नजरें एक पल के लिए ठहर गईं। क्योंकि कंधा देने के लिए आगे बढ़ी थीं उनकी बेटी—बृजेश कंवर। समाज की नजर में भले ही वह “बेटी” थीं, लेकिन उनके पिता के लिए वह हमेशा “बेटा” रही थीं।

पिता का सपना और बेटी का वादा

मोहन सिंह राजावत लंबे समय से ब्रेन कैंसर से जूझ रहे थे। इस कठिन समय में उन्होंने अक्सर कहा था “मेरी बेटी किसी बेटे से कम नहीं है… और मेरी अंतिम विदाई भी वही करेगी।” आज वही शब्द हकीकत बन गए। बृजेश कंवर ने अपने आंसुओं को भीतर समेटकर, खुद को मजबूत किया और अपने पिता की अंतिम इच्छा को पूरा किया।

अर्थी से श्मशान तक का सफर

सबसे पहले बृजेश कंवर ने अपने पिता को पुष्पांजलि अर्पित की। इसके बाद उन्होंने स्वयं कंधा देकर अर्थी को श्मशान घाट तक पहुंचाया। हर कदम पर दर्द था, लेकिन साथ ही एक बेटी का अटूट साहस भी।

मुखाग्नि का वह ऐतिहासिक पल

श्मशान घाट पर जब अंतिम संस्कार की रस्में शुरू हुईं, तो माहौल पूरी तरह शांत हो गया। और फिर वह पल आया जिसने सबको भावुक कर दिया—बृजेश कंवर ने कांपते हाथों से अपने पिता को मुखाग्नि दी। यह सिर्फ एक रस्म नहीं थी… बल्कि सदियों पुरानी सामाजिक परंपराओं को एक नई सोच की चुनौती थी।

परिवार का समर्थन बना ताकत

इस पूरे फैसले में परिवार का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण रहा। बृजेश कंवर ने इस कदम से पहले अपने पति और ससुर से अनुमति ली, और सबसे खास बात यह रही कि परिवार ने उन्हें रोका नहीं, बल्कि पूरा सहयोग और हौसला दिया।

बदलती सोच की एक मिसाल

यह घटना केवल एक अंतिम संस्कार नहीं है, बल्कि एक संदेश है—कि बेटियां किसी भी जिम्मेदारी से पीछे नहीं होतीं।बृजेश कंवर ने साबित किया कि—

  • जिम्मेदारी का कोई लिंग नहीं होता
  • प्रेम और संस्कार सबसे बड़ी ताकत हैं
  • और अंतिम विदाई का अधिकार भी उसी का है, जिसने सबसे अधिक प्रेम किया हो

निष्कर्ष

सवाई माधोपुर की यह घटना अब सिर्फ एक खबर नहीं रही, बल्कि एक प्रेरणा बन चुकी है। यह कहानी उस बदलाव की शुरुआत है, जहां परंपराएं टूटती नहीं… बल्कि नए रूप में फिर से लिखी जाती हैं। बृजेश कंवर ने आज यह साबित कर दिया कि जब बेटी ठान ले, तो वह सिर्फ इतिहास नहीं बदलती… बल्कि नया इतिहास रच देती है।