“पचपदरा रिफाइनरी के बीच ‘पानी संकट’: विकास की चमक या गांवों की कड़वी सच्चाई?”
पचपदरा रिफाइनरी के उद्घाटन की तैयारियों के बीच आसपास के गांवों में गंभीर जल संकट सामने आया है। ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
मारवाड़ की तपती रेत में जहां एक तरफ विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। पचपदरा रिफाइनरी के उद्घाटन की तैयारियां जोरों पर हैं और इसे राजस्थान के औद्योगिक भविष्य की बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है।
लेकिन इसी प्रोजेक्ट के आसपास बसे दर्जनों गांवों में लोग आज भी पीने के पानी की गंभीर किल्लत से जूझ रहे हैं।
“बूंद-बूंद पानी” की जंग
रिपोर्ट के अनुसार, कई गांवों में पेयजल आपूर्ति 10 से 12 दिन के अंतराल पर हो रही है। हालात ऐसे हैं कि ग्रामीणों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए महंगा पानी खरीदना पड़ रहा है।
गर्मी की शुरुआत में ही हालात बिगड़ने से पशुपालकों और किसानों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
कागजों पर योजना, जमीन पर संकट
उम्मेदसागर-धवा-कल्याणपुर-समदड़ी-खंडप पेयजल योजना कागजों पर तो सक्रिय है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका असर कमजोर बताया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि सिस्टम की लापरवाही और निगरानी की कमी के कारण जल संकट लगातार बढ़ता जा रहा है।
कई गांवों में गंभीर स्थिति
समदड़ी, रामपुरा, चिरडिया, खरंटिया, मजल, अजीत, पातों का बाड़ा सहित कई गांवों में हालात बेहद खराब हैं।
लोगों को मजबूरी में टैंकरों से पानी खरीदना पड़ रहा है, जिससे आर्थिक बोझ भी बढ़ गया है।
पशुपालकों पर सबसे ज्यादा असर
पानी की कमी का सबसे बड़ा असर पशुपालन पर पड़ा है। ग्रामीणों को अब तय करना पड़ रहा है कि पहले अपनी प्यास बुझाएं या पशुओं की जरूरत पूरी करें।
ग्रामीणों का आरोप
ग्रामीणों का कहना है कि:
जलापूर्ति बेहद अनियमित है
टैंकर पानी महंगे दामों पर मिल रहा है
प्रशासनिक निगरानी कमजोर है
बड़ा सवाल
जहां एक तरफ प्रधानमंत्री के दौरे से औद्योगिक विकास की उम्मीदें बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ गांवों की यह स्थिति विकास मॉडल पर सवाल खड़े कर रही है।
क्या विकास सिर्फ बड़े प्रोजेक्ट्स तक सीमित रह जाएगा, या गांवों तक भी इसका असर पहुंचेगा?