अरावली संरक्षण: ग्रीनमैन नरपतसिंह राजपुरोहित ने खून से लिखी चिट्ठी, कलेक्टर टीना डाबी को सौंपी

बाड़मेर के पर्यावरण प्रेमी नरपतसिंह राजपुरोहित ने अरावली पर्वतमाला के संरक्षण की मांग को लेकर अपने खून से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन लिखा और इसे जिला कलेक्टर टीना डाबी को सौंपा। उन्होंने कहा कि यह चिट्ठी अरावली के आंसुओं से लिखी गई है। यह विरोध सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2025 के उस फैसले के खिलाफ है, जिसमें 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा नहीं माना जाएगा, जिससे 90% से अधिक क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो सकता है और खनन व रियल एस्टेट को बढ़ावा मिल सकता है। देशभर में #SaveAravalli अभियान चल रहा है।

Dec 25, 2025 - 11:14
अरावली संरक्षण: ग्रीनमैन नरपतसिंह राजपुरोहित ने खून से लिखी चिट्ठी, कलेक्टर टीना डाबी को सौंपी

राजस्थान के बाड़मेर जिले में अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर पर्यावरण प्रेमी और ग्रीनमैन के नाम से मशहूर नरपतसिंह राजपुरोहित ने एक अनोखा लेकिन भावुक कदम उठाया है। उन्होंने अपने खून से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम एक ज्ञापन लिखा और इसे जिला कलेक्टर टीना डाबी को सौंपा। यह घटना दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में हुई, जब अरावली को लेकर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन जोर पकड़ रहे हैं। नरपतसिंह ने स्पष्ट किया कि यह चिट्ठी उनके खून से नहीं, बल्कि "अरावली के आंसुओं" से लिखी गई है, जो पर्वतमाला के विनाश की पीड़ा को दर्शाती है।

घटना का विवरण बुधवार को नरपतसिंह राजपुरोहित जिला कलेक्ट्रेट पहुंचे और कलेक्टर टीना डाबी को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में "अरावली बचाओ" जैसे नारे लिखे थे। कलेक्टर ने इसे राष्ट्रपति तक पहुंचाने का आश्वासन दिया। नरपतसिंह ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट की अरावली संबंधी व्याख्या बहुत दुखदायी है। 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा नहीं मानकर खनन की अनुमति देना राजस्थान के ऑक्सीजन जोन और रीढ़ की हड्डी को नष्ट कर देगा। इससे सैकड़ों जिंदगियां बर्बाद हो जाएंगी और आसपास के जिलों में दिल्ली जैसे प्रदूषण के हालात बन जाएंगे।"

अरावली की पारिस्थितिक महत्वता अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो गुजरात से दिल्ली तक लगभग 700 किलोमीटर फैली हुई है। यह थार मरुस्थल के पूर्वी विस्तार को रोकती है, भूजल रिचार्ज करती है, जैव विविधता को संरक्षण देती है और उत्तर भारत की जलवायु को संतुलित रखती है। यह चंबल, साबरमती और लूनी जैसी नदियों का स्रोत भी है। अरावली को "उत्तर भारत की जीवनरेखा" कहा जाता है, क्योंकि यह रेगिस्तान की रेत को गंगा के मैदानों तक पहुंचने से रोकती है।

विवाद की जड़: सुप्रीम कोर्ट का फैसला विवाद की मुख्य वजह नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला है, जिसमें अरावली की एकसमान परिभाषा स्वीकार की गई। अब "अरावली हिल" वह भूमि मानी जाएगी जो स्थानीय आधार से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची हो, साथ ही उसकी ढलानें और आसपास का क्षेत्र शामिल। दो ऐसी पहाड़ियां यदि 500 मीटर के दायरे में हों, तो बीच का क्षेत्र भी अरावली रेंज का हिस्सा माना जाएगा।पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे राजस्थान में अरावली का बड़ा हिस्सा (कुछ अनुमानों के अनुसार 90% से अधिक) कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएगा, क्योंकि अधिकांश पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंची हैं। इससे खनन माफिया और रियल एस्टेट को खुली छूट मिल सकती है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के आंतरिक आकलन का हवाला देते हुए रिपोर्ट्स में कहा गया कि राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से केवल 8.7% ही 100 मीटर से ऊंची हैं। हालांकि, FSI ने बाद में स्पष्ट किया कि उसने ऐसा कोई आधिकारिक अध्ययन नहीं किया है।सरकार का पक्ष है कि यह परिभाषा वैज्ञानिक और पारदर्शी है, अवैध खनन रोकेगी और संरक्षण को मजबूत करेगी। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि अरावली की हरियाली ही इसकी सुरक्षा की दीवार है, और नई परिभाषा से अधिक क्षेत्र सुरक्षित रहेगा।

देशव्यापी विरोध और #SaveAravalli अभियान इस फैसले के बाद #SaveAravalli सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। राजस्थान के उदयपुर, चित्तौड़गढ़, सिरोही, जोधपुर सहित कई जिलों में प्रदर्शन हो रहे हैं। ग्रामीण उपवास, पैदल मार्च और महापंचायतें कर रहे हैं। कांग्रेस नेता अशोक गहलोत सहित विपक्षी दल इसे केंद्र सरकार की "खनन माफिया को सौगात" बता रहे हैं। हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में भी विरोध तेज है, क्योंकि अरावली यहां की हवा और पानी की गुणवत्ता के लिए महत्वपूर्ण है।

नरपतसिंह राजपुरोहित जैसे पर्यावरण प्रेमी इस आंदोलन की आवाज बन रहे हैं। उनकी खून से लिखी चिट्ठी अरावली की पुकार का प्रतीक बन गई है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि सभी पहाड़ियों को संरक्षण नहीं मिला, तो रेगिस्तानीकरण तेज होगा, भूजल सूखेगा और उत्तर भारत में प्रदूषण दिल्ली जैसे स्तर पर पहुंच जाएगा।

Mohit Parihar Mohit Parihar is a journalist at The Khatak, covering politics and public issues with a strong focus on ground reporting and factual storytelling.