Dholpur: चंबल की रेत बनी ‘लाल सोना’... माफिया के खून-खेल पर सुप्रीम कोर्ट का शिकंजा

चंबल नदी के किनारों पर कुछ ऐसा हो रहा है, जिसने राजस्थान, एमपी और यूपी की नींद उड़ा दी है। ‘बजरी’ की इस खामोश जंग में अब सुप्रीम कोर्ट भी उतर चुका है—लेकिन असली खेल अभी बाकी है…

May 1, 2026 - 17:47
Dholpur: चंबल की रेत बनी ‘लाल सोना’... माफिया के खून-खेल पर सुप्रीम कोर्ट का शिकंजा

राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को जोड़ने वाली चंबल नदी इन दिनों किसी प्राकृतिक धरोहर से ज्यादा एक खतरनाक ‘रेड जोन’ बनती जा रही है। वजह है—बजरी, जिसे अब स्थानीय लोग ‘लाल सोना’ कहने लगे हैं।

यह वही रेत है जो निर्माण कार्यों के लिए बेहद जरूरी है, लेकिन इसकी अवैध खनन ने पूरे इलाके को अपराध और खून-खराबे की जमीन बना दिया है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि माफिया इस ‘सोने’ को पाने के लिए कानून और इंसानियत दोनों को कुचलने से नहीं हिचक रहे। हाल ही में मध्य प्रदेश के मुरैना में एक वनकर्मी की जान चली गई—और यही घटना पूरे सिस्टम को झकझोर गई।

 सुप्रीम कोर्ट की एंट्री, सख्त संदेश

अब इस पूरे मामले में देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने सीधा दखल दिया है। 1 मई को कोर्ट की केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) के सदस्य चंद्रप्रकाश गोयल खुद धौलपुर के चंबल घाटों पर पहुंचे।

यह दौरा औपचारिक नहीं, बल्कि एक ‘ग्राउंड ऑपरेशन’ जैसा था—जहाँ बोटिंग के जरिए उन रास्तों को चिन्हित किया गया, जिनसे अवैध बजरी की निकासी होती है। यह साफ संकेत है कि अब कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहेगी।

 तीन राज्यों की संयुक्त रणनीति

मुरैना की घटना के बाद राजस्थान और मध्य प्रदेश के प्रशासन ने संयुक्त रणनीति बनानी शुरू कर दी है। यूपी को भी इस प्लान में शामिल किया गया है, क्योंकि माफिया सीमाओं का फायदा उठाकर एक राज्य से दूसरे राज्य में आसानी से भाग निकलते हैं।

अब योजना है कि चंबल के हर घाट पर निगरानी बढ़ाई जाए, चेकपोस्ट्स को मजबूत किया जाए और माफियाओं के नेटवर्क को जड़ से खत्म किया जाए।

क्यों बन गई ‘लाल सोना’ बजरी?

बजरी की बढ़ती मांग और सीमित वैध खनन ने इसकी कीमत को आसमान पर पहुंचा दिया है। इसी वजह से यह कारोबार माफियाओं के लिए ‘सोने की खान’ बन गया है।

अवैध खनन से सरकार को करोड़ों का नुकसान

पर्यावरण को गंभीर खतरा

स्थानीय लोगों की सुरक्षा पर संकट

 आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिए हैं—मई के अंत तक सिर्फ रिपोर्ट नहीं, बल्कि जमीनी नतीजे चाहिए। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में चंबल घाटी में बड़े स्तर पर कार्रवाई देखने को मिल सकती है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या प्रशासन की यह सख्ती सच में माफियाओं की कमर तोड़ेगी?

या फिर यह अभियान भी कागजों तक सीमित रह जाएगा?

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