EWS Reservationपर नई जंग छिड़ी... ‘राजस्थान फॉर्मूला’ को देशभर में लागू करने की मांग, PM से मुलाकात की तैयारी
राजस्थान के लाखों युवाओं से जुड़ा EWS विवाद गरमाया—एक मांग ने केंद्र सरकार को घेरा, अब सबकी नजर फैसले पर।
राजस्थान की राजनीति में अब ‘हक’ और ‘हिस्सेदारी’ की लड़ाई एक नए मोड़ पर पहुँच चुकी है। यह मुद्दा अब केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दिल्ली के सत्ता गलियारों तक दस्तक दे रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे एक बड़े सियासी विमर्श में बदलता जा रहा है।
आरटीडीसी के पूर्व चेयरमैन धर्मेंद्र राठौड़ ने बीकानेर के सर्किट हाउस में प्रेस वार्ता के दौरान केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि मौजूदा नियमों के कारण लाखों योग्य युवा आरक्षण के लाभ से वंचित रह रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की कि राजस्थान में लागू ‘सरल EWS मॉडल’ को पूरे देश में लागू किया जाए।
क्या है राजस्थान का EWS मॉडल?
राठौड़ के अनुसार, केंद्र सरकार ने 2019 में 10% EWS आरक्षण लागू किया, लेकिन इसके साथ कई जटिल शर्तें जोड़ दीं—जैसे 5 एकड़ से अधिक जमीन नहीं होनी चाहिए, शहरी क्षेत्र में 100 वर्ग गज से अधिक प्लॉट या 1000 वर्ग फीट से बड़ा फ्लैट नहीं होना चाहिए।
इन शर्तों के चलते कई ऐसे मध्यम वर्गीय परिवार भी इस दायरे से बाहर हो जाते हैं, जो वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर हैं।
वहीं, अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली पूर्व राजस्थान सरकार ने इन संपत्ति संबंधी शर्तों को पूरी तरह हटा दिया। केवल ₹8 लाख की आय सीमा को आधार बनाकर EWS प्रमाण पत्र जारी करने का फैसला लिया गया।
इसके अलावा:
प्रमाण पत्र की वैधता 1 साल से बढ़ाकर 3 साल की गई
पुरुषों को 5 वर्ष और महिलाओं को 10 वर्ष की आयु सीमा में छूट दी गई
केंद्रीय नौकरियों में क्यों हो रहा नुकसान?
यही अंतर अब सबसे बड़ी समस्या बन गया है। राजस्थान का युवा जब राज्य सरकार की नौकरियों में आवेदन करता है, तो उसे आसानी से EWS का लाभ मिल जाता है। लेकिन जैसे ही वह SSC, UPSC या रेलवे जैसी केंद्रीय भर्तियों में आवेदन करता है, केंद्र के सख्त नियम उसे अयोग्य बना देते हैं।
राठौड़ का कहना है कि यह दोहरी व्यवस्था युवाओं के साथ अन्याय है और इसे तुरंत ठीक करने की जरूरत है।
आंदोलन का विस्तार और राजनीतिक रणनीति
इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए धर्मेंद्र राठौड़ राज्यभर में जन जागरण अभियान चला रहे हैं। अलवर, अजमेर, जोधपुर, बाड़मेर और जैसलमेर जैसे जिलों में वे लगातार सभाएं कर चुके हैं।
अब उनकी योजना सीधे प्रधानमंत्री से मुलाकात कर इस मुद्दे को सामने रखने की है।
दिलचस्प बात यह है कि यह मुद्दा अब केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं रह गया है। राठौड़ अन्य दलों और सामाजिक संगठनों को भी साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे यह एक सर्वदलीय आंदोलन का रूप ले सकता है।
सियासी असर और आगे की राह
यह अभियान राजस्थान की राजनीति में एक नया समीकरण बना सकता है। अगर केंद्र सरकार अपने नियमों में बदलाव नहीं करती है, तो विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बना सकता है।
सवर्ण और मध्यम वर्ग के बीच यह संदेश तेजी से फैल रहा है कि ‘राजस्थान मॉडल’ उन्हें ज्यादा राहत देता है। ऐसे में आने वाले समय में यह मुद्दा राज्य और केंद्र के बीच टकराव का बड़ा कारण बन सकता है।
सबसे बड़ा सवाल
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या केंद्र सरकार अपने नियमों में बदलाव करेगी, या फिर यह मुद्दा आने वाले चुनावों में एक बड़ा सियासी हथियार बनेगा?